बिहार में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (27 मई 2026) को अहम फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं कर सकता, लेकिन जिन लोगों की नागरिकता पर संदेह हो, उनकी जानकारी केंद्र सरकार को भेज सकता है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि संदिग्ध नागरिकता वाले मामलों की जानकारी चार सप्ताह के भीतर सक्षम प्राधिकरण को भेजी जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित अथॉरिटी अगले चुनाव से पहले इन मामलों पर फैसला करे।
NRC जैसी प्रक्रिया बताने वाली दलील पर क्या बोला SC?
SIR प्रक्रिया के खिलाफ दाखिल याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि यह प्रक्रिया राष्ट्रीय नागरिक पंजी (NRC) जैसी है और चुनाव आयोग नागरिकता की जांच कर रहा है, जबकि ऐसा करने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा, “चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं करता. हालांकि, वह संदिग्ध लोगों का मामला केंद्र सरकार को भेज सकता है.”
कोर्ट ने कहा कि SIR प्रक्रिया संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) के अनुरूप है और चुनाव आयोग को इतनी व्यापक प्रक्रिया के लिए नियम और व्यवस्था तय करने का अधिकार प्राप्त है।
वोटर्स पर बोझ डालने वाली दलील भी खारिज
सुनवाई के दौरान यह तर्क दिया गया था कि SIR प्रक्रिया में मतदाताओं पर खुद को साबित करने का अतिरिक्त बोझ डाला जा रहा है। इस दलील को भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया।
अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुराने निवास स्थान से कहीं और शिफ्ट हो गया है, तब भी वह पुरानी SIR प्रक्रिया से बाहर नहीं माना जाएगा। कोर्ट के अनुसार उसके या उसके परिवार का रिकॉर्ड पुराने दस्तावेजों में मौजूद होगा।
दस्तावेजों की जांच को नहीं माना मनमाना
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग ने दस्तावेजों की विश्वसनीयता के आधार पर निर्णय लिया है और इसे मनमाना नहीं कहा जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, “यह नहीं माना जा सकता कि एसआईआर का उद्देश्य लोगों को मतदाता सूची से बाहर करना था.”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यदि कोई दस्तावेज सही नहीं पाया जाता, तो चुनाव आयोग नाम जोड़ने से इनकार कर सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि आयोग नागरिकता तय कर रहा है।
बिहार SIR मामले में क्या था विवाद?
यह मामला बिहार में कराए गए स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की वैधता से जुड़ा था। याचिकाकर्ताओं ने दावा किया था कि चुनाव आयोग संविधान के अनुच्छेद 326 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मिली शक्तियों से आगे बढ़कर काम कर रहा है।
सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना था कि मौजूदा स्वरूप में SIR प्रक्रिया संवैधानिक है या नहीं। अब अदालत ने चुनाव आयोग को राहत देते हुए इस प्रक्रिया को वैध माना है।