केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार (7 अप्रैल, 2026) को हुई सुनवाई के दौरान धर्म, आस्था और संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 पर विस्तृत चर्चा हुई। अदालत धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े विभिन्न मामलों की संयुक्त सुनवाई कर रही है, जिनका निपटारा 22 अप्रैल तक किया जाना है। इन याचिकाओं में मस्जिदों में महिलाओं की एंट्री, दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं के खतना और दूसरे धर्म में विवाह करने वाली पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार जैसे मुद्दे भी शामिल हैं।
केंद्र ने प्रतिबंध जारी रखने की वकालत की
केंद्र सरकार ने अपने हलफनामे में सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध बनाए रखने का समर्थन किया है। केंद्र का कहना है कि भगवान अयप्पा को नैष्ठिक ब्रह्मचारी माना जाता है और महिलाओं के प्रवेश से मंदिर की पारंपरिक पूजा पद्धति प्रभावित हो सकती है, जिससे संविधान द्वारा संरक्षित धार्मिक विविधता पर असर पड़ेगा।
धर्म की विविधता पर SG तुषार मेहता की दलील
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि भारत में धर्मों की संरचना बेहद व्यापक और विविध है। उन्होंने बताया कि हिंदू धर्म के भीतर कई उप-संप्रदाय हैं जिनकी अलग पहचान और परंपराएं हैं, वहीं इस्लाम में एक पवित्र ग्रंथ और संस्थापक होने के बावजूद आंतरिक विविधताएं मौजूद हैं।
उन्होंने कहा कि अदालत को धार्मिक मामलों की व्याख्या करते समय इन विविधताओं को ध्यान में रखना चाहिए और यह समझना जरूरी है कि न तो हिंदू धर्म एकरूप है और न ही इस्लाम।
संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता पर जोर
तुषार मेहता ने कहा कि भारत के संविधान में कुछ स्वतंत्रताएं अमेरिकी संविधान से ली गई हैं, लेकिन अनुच्छेद 25 और 26 विशेष रूप से भारतीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। उन्होंने हिंदू धर्म के दशनामी संप्रदाय का उदाहरण देते हुए बताया कि अलग-अलग संप्रदायों की पहचान उनके नाम, परंपरा और आचार-विचार से होती है।
उन्होंने कहा कि जो लोग पारंपरिक श्रेणियों में नहीं आते, वे भी व्यापक रूप से हिंदू पहचान का हिस्सा हो सकते हैं और धार्मिक पहचान केवल पूजा-पद्धति से तय नहीं होती।
‘मैं नास्तिक होने के बावजूद हिंदू हो सकता हूं’
सुनवाई के दौरान तुषार मेहता ने कहा, ‘मैं नास्तिक होने, मूर्ति पूजा में विश्वास न करने और चार्वाक फिलॉसफी को मानने के बावजूद भी हिंदू हो सकता हूं इसलिए सुनवाई के समय इसको ध्यान में रखना चाहिए.’ उन्होंने यह भी बताया कि अनुच्छेद 26(b) केवल संप्रदाय ही नहीं बल्कि उसके अंतर्गत आने वाले वर्गों को भी अधिकार देता है।
धार्मिक स्थलों के उदाहरण से रखा तर्क
अपनी दलील को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि शिरडी में सभी हिंदू संप्रदायों के लोग जाते हैं और निजामुद्दीन औलिया दरगाह में भी हर धर्म के लोग पहुंचते हैं। उन्होंने कहा कि जब हर कोई किसी धार्मिक स्थल पर जाता है तो उसे किसी एक संप्रदाय तक सीमित करना कठिन हो जाता है।
सुनवाई में कई धार्मिक मुद्दों पर होगा फैसला
सुप्रीम कोर्ट अब महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक सीमा से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों पर फैसला करने की तैयारी कर रहा है। माना जा रहा है कि इस मामले का निर्णय भविष्य में धर्म और समानता से जुड़े कई मामलों की दिशा तय कर सकता है।