केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़े बहुचर्चित मामले की सुनवाई के दौरान बुधवार (8 अप्रैल, 2026) को सुप्रीम कोर्ट में तीखी बहस देखने को मिली। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट कहा कि उसके पास यह तय करने का अधिकार है कि किसी धर्म की कोई प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है या नहीं। यह टिप्पणी केंद्र सरकार की उस दलील के जवाब में आई, जिसमें कहा गया था कि न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं, इसलिए धार्मिक मामलों पर फैसला करना अदालत के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
केंद्र ने कोर्ट की भूमिका पर उठाए सवाल
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ-जजों की संविधान पीठ धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश, भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता के दायरे से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सवाल उठाया कि अदालत यह कैसे तय करेगी कि कोई धार्मिक प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है।
उन्होंने कहा, ‘मान लें कि कोई प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है, तब भी यह तय करना अदालत का काम नहीं है. संविधान के अनुच्छेद 25(2)(बी) के तहत यह काम विधायिका का है कि वह सुधार के लिए कानून बनाए.’ उन्होंने यह भी कहा कि संसद या राज्य विधानसभाएं किसी प्रथा को अंधविश्वास मानकर उसके खिलाफ कानून बना सकती हैं, जैसे काला जादू रोकने से जुड़े कानून।
सुप्रीम कोर्ट का जवाब — अधिकार अदालत के पास
केंद्र की इस दलील पर जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला ने कहा कि यह तर्क बहुत सरल है और अदालत के पास यह तय करने का अधिकार है कि कोई प्रथा अंधविश्वास पर आधारित है या नहीं। उन्होंने कहा, ‘इसके बाद क्या कदम उठाना है, यह विधायिका देख सकती है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि जो विधायिका तय करे वही अंतिम होगा.’
इसके बाद तुषार मेहता ने कहा, ‘माननीय न्यायाधीश कानून के विशेषज्ञ हैं, धर्म के नहीं.’ उन्होंने तर्क दिया कि एक धर्मनिरपेक्ष अदालत किसी धार्मिक प्रथा को अंधविश्वास घोषित नहीं कर सकती क्योंकि उसके पास धार्मिक मामलों में विशेषज्ञता नहीं होती। उन्होंने यह भी कहा कि भारत जैसे विविध समाज में जो चीज एक स्थान पर धार्मिक मानी जाती है, वही दूसरी जगह अंधविश्वास समझी जा सकती है।
जजों के तीखे सवाल
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने सवाल उठाया कि अगर जादू-टोना किसी धर्म का हिस्सा बताया जाए, तो क्या उसे अंधविश्वास नहीं माना जाएगा? उन्होंने यह भी पूछा कि यदि विधायिका इस विषय पर चुप रहती है, तो क्या अदालत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
इस पर तुषार मेहता ने जवाब दिया कि अदालत समीक्षा कर सकती है, लेकिन ‘अंधविश्वास’ के आधार पर नहीं बल्कि ‘स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था’ के आधार पर।
धार्मिक प्रथाओं को समझने पर जस्टिस नागरत्ना की टिप्पणी
संविधान पीठ की इकलौती महिला जज जस्टिस बी. वी. नागरत्ना ने कहा कि किसी धार्मिक प्रथा को समझने के लिए उसे उसी धर्म के दर्शन के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ‘किसी दूसरे धर्म के नजरिए से यह नहीं कहा जा सकता कि यह जरूरी धार्मिक प्रथा नहीं है. अदालत को उसी धर्म के सिद्धांतों के आधार पर फैसला करना चाहिए, लेकिन यह सब स्वास्थ्य, नैतिकता और सार्वजनिक व्यवस्था के अधीन होना चाहिए.’
2018 के ऐतिहासिक फैसले से जुड़ा मामला
गौरतलब है कि सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच-जजों की संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश पर लगे प्रतिबंध को अवैध और असंवैधानिक करार देते हुए हटा दिया था। बाद में 14 नवंबर 2019 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली दूसरी पीठ ने महिलाओं से भेदभाव से जुड़े व्यापक संवैधानिक सवालों को 3:2 बहुमत से बड़ी संविधान पीठ के पास भेज दिया था।