गुरुवार को एनआईए कोर्ट ने 2008 के मालेगांव ब्लास्ट केस में सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। इस सूची में भारतीय जनता पार्टी की पूर्व सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, और अन्य पांच नाम शामिल हैं। अदालत ने यह फैसला मुख्य रूप से इस आधार पर लिया कि कोई भी गवाह अपने पुराने बयानों पर कायम नहीं रहा, जिससे आरोप सिद्ध नहीं हो सके।
छह की मौत, सौ से ज्यादा घायल, लेकिन नहीं मिला दोष साबित करने का आधार
29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव कस्बे में एक मस्जिद के पास मोटरसाइकिल में बंधे बम विस्फोट में छह लोगों की जान गई थी और 100 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। इस घटना के बाद सात लोगों पर UAPA (गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम) के तहत मुकदमा दर्ज हुआ था।
शुरुआती जांच ATS के पास थी, बाद में NIA ने संभाला केस
शुरुआत में यह मामला महाराष्ट्र एंटी टेररिस्ट स्क्वॉड (ATS) को सौंपा गया था। ATS ने आरोप लगाया था कि धमाके में इस्तेमाल हुई बाइक साध्वी प्रज्ञा के नाम पर रजिस्टर्ड थी। इसके बाद 2011 में केस NIA को ट्रांसफर कर दिया गया। ATS ने यह भी दावा किया था कि धमाके से पहले भोपाल, इंदौर समेत अन्य शहरों में कई गुप्त बैठकें की गई थीं।
सालों तक चला मुकदमा, 2025 में हुआ समापन
इस केस की सुनवाई 2018 में शुरू हुई और 19 अप्रैल 2025 को पूरी हुई। इसके बाद अदालत ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो अब आ गया है।
कोर्ट के फैसले का निचोड़
अदालत ने कहा कि पर्याप्त सबूतों के अभाव में आरोपियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। चश्मदीद गवाहों के पलटने और पर्याप्त फोरेंसिक साक्ष्यों की कमी के चलते सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी किया गया।