
२२ अगस्त की शाम करोड़ों भारतीयों एवं भारतप्रेमियों की सांसें अटकी हुई थीं। इसरो के लैंडर का चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव की सतह पर स्पर्श होते ही लोगों ने राहत की सांस ली और उत्साह के साथ इस उपलब्धि के आनंद में डूब गए। इस उपलब्धि की गूंज न केवल भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान के पवित्र मंदिर में सुनी गई, बल्कि पूरे विश्व ने संसार में पहली बार भारत को मिली इस अद्भुत सफलता पर उसका नमन-अभिनंदन किया। लैंडर विक्रम के चंद्रमा की सतह पर उतरने के साथ ही अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में नए ऐतिहासिक अध्याय का आरंभ हुआ। विक्रम की सक्रियता के साथ रोवर प्रज्ञान ने भी अपना कार्य करना शुरू कर दिया। इसरो के इस अभियान ने अंतरिक्ष अनुसंधान पर अपनी ऐसी अमिट छाप छोड़ी है, जो मिटाए नहीं मिट सकेगी।वास्तव में, चंद्रयान-3 के माध्यम से दक्षिणी ध्रुव पर विजयी लैंडिंग तक की यात्रा मानवीय नवाचार और अटल समर्पण का एक अनुपम उदाहरण है। इसका पूरा श्रेय भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के उस परिवेश को जाता है, जहां ऐसी आकांक्षाओं को संकल्प के पंख लगे। स्मरण रहे कि 1976 से पहले रूस के 24 लूना मिशनों में साफ्ट लैंडिंग सफलता दर लगभग 20 प्रतिशत थी। उस हिसाब से इसरो की सफलता को सहज ही समझा जा सकता है। इसरो की सफलता न केवल चंद्रमा से जुड़े अन्वेषण को नया आयाम देगी, बल्कि वहां स्थायी मानव बस्तियों की बसावट का सपना भी दिखा सकती है।स्पष्ट है कि भारत विश्व के लिए एक उचित विकल्प के रूप में स्थापित हो रहा है। इस सफलता के पीछे पुरुषार्थ एवं परिश्रम को अनदेखा नहीं किया जा सकता। यदि 2019 के चंद्रयान-2 की असफलताओं से सीख नहीं ली जाती तो इसरो शायद चंद्रयान-3 के रूप में सफलता हासिल नहीं कर पाता। जब 2019 में चंद्रयान-2 का लैंडर अपनी मंजिल से चंद मीटर की दूरी पर क्रैश हो गया था तो तमाम सवाल उठे थे। इसरो की क्षमताओं और भारत की प्राथमिकताओं को प्रश्नांकित किया गया था। असफलताओं से हताश होना तो इसरो जैसे संस्थानों के शब्दकोश में ही नहीं। चंद्रयान-3 का असली काम अब शुरू हुआ है। इस पर लगे पेलोड से हमें चांद से जुड़ी तमाम बारीकियां पता चलेंगी। इसके चार पेलोड को हम चांद की धरती के इतिहास का संग्रहालय भी कह सकते हैं, जिनके माध्यम से हमें तमाम गुत्थियां सुलझाने में मदद मिलेगी। चांद पर आने वाले उन भूकंप के बारे में अहम जानकारियां मिलेंगी, जो भविष्य में मून बेस कैंप के लिए काफी आवश्यक होंगी। इसके पेलोड चांद की मिट्टी में उपस्थित खनिजों की पड़ताल भी करेंगे।विक्रम और प्रज्ञान 14 दिन तक अपने काम में जुटे रहेंगे। प्रज्ञान विक्रम से सीधी बात कर सकता है, लेकिन पृथ्वी से नहीं। प्रज्ञान, विक्रम के 500 मीटर के दायरे में घूम सकता है। इसे कैमरे की मदद से इसरो ग्राउंड स्टेशन से नियंत्रित किया जाएगा। कुल मिलाकर, अगले करीब एक पखवाड़े के दौरान देश के शीर्ष अंतरिक्ष विज्ञानी इन दोनों के साथ व्यस्त रहकर मानव जाति के लिए चंद्रमा से जुड़ी नई-नई जानकारियां तलाशने और उनकी व्याख्या करने में लगे रहेंगे।