9 घंटे तक बंधक बने न्यायिक अधिकारी, सुप्रीम कोर्ट की सख्त फटकार से हिली बंगाल राजनीति

पश्चिम बंगाल में चुनावी माहौल के बीच एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने राजनीतिक और न्यायिक गलियारों में हलचल मचा दी है। मालदा जिले में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) प्रक्रिया से जुड़े न्यायिक अधिकारियों को करीब 9 घंटे तक बंधक बनाए जाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। इस पूरे घटनाक्रम को लेकर राज्य की कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

मालदा में कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद

जानकारी के अनुसार, पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में स्पेशल इंटेंसिव रिविजन प्रक्रिया के तहत कार्य कर रहे सात न्यायिक अधिकारियों को कथित तौर पर प्रदर्शनकारियों ने लगभग नौ घंटे तक घेरकर रखा। यह मामला उस समय शुरू हुआ जब बुधवार को कालियाचक II ब्लॉक डेवलपमेंट ऑफिस (BDO) के बाहर वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरू हुआ।

प्रदर्शनकारियों ने न्यायिक अधिकारियों से सीधे मुलाकात की मांग की, लेकिन अनुमति नहीं मिलने पर शाम करीब 4 बजे बीडीओ कार्यालय का घेराव कर दिया गया। इस दौरान तीन महिलाओं समेत सात न्यायिक अधिकारियों को अंदर ही रोक लिया गया। अधिकारियों के साथ एक पांच साल का बच्चा भी मौजूद था, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई।

SIR प्रक्रिया और विवाद की जड़

बताया जा रहा है कि SIR प्रक्रिया के तहत अंतिम मतदाता सूची से 63 लाख से अधिक नाम हटाए गए थे, जबकि करीब 60 लाख मतदाताओं को जांच के दायरे में रखा गया था। संबंधित न्यायिक अधिकारी इन मामलों की समीक्षा कर रहे थे और तय कर रहे थे कि किन नामों को सूची में रखा जाए और किन्हें हटाया जाए। यह पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप चल रही थी।

इसी कार्रवाई को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध तेज हो गया और मामला बंधक बनाए जाने जैसी गंभीर स्थिति तक पहुंच गया।

पुलिस ने रात 1 बजे कराया रेस्क्यू, सड़क पर हंगामा

करीब 9 घंटे बाद रात लगभग 1 बजे पुलिस टीम ने मौके पर पहुंचकर न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षित बाहर निकाला। अधिकारियों को निकालते समय प्रदर्शनकारियों ने पुलिस वाहनों पर पथराव किया और कई जगह गाड़ियों का पीछा भी किया गया। इस घटना से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं।

प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने NH-12 पर बेंच और फर्नीचर लगाकर सड़क जाम किया, टायर जलाए और सड़क पर चूल्हा जलाकर खाना बनाते हुए विरोध दर्ज कराया। मामले में अब तक 18 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।

बीजेपी के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री सुकांत मजूमदार ने स्थिति को बेकाबू होने के लिए ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया है। बीजेपी का आरोप है कि अधिकारियों को लगातार धमकियां दी जा रही थीं और आंदोलनकारियों ने हमला करने की योजना भी बनाई थी।

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, CJI की सख्त टिप्पणी

गुरुवार को जब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो अदालत ने कड़ी नाराजगी जताई और इसे न्यायिक अधिकारों को चुनौती देने वाला मामला बताया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल पंचोली की पीठ ने राज्य सरकार की भूमिका पर गंभीर टिप्पणी की।

सीजेआई ने बंगाल के वकील को फटकार लगाते हुए कहा, “रात 11 बजे तक आपका कलेक्टर वहां मौजूद नहीं था. मुझे रात में मौखिक रूप से बहुत सख्त आदेश देने पड़े. एक पांच साल के बच्चे को खाना और पानी भी नहीं दिया गया.”

अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों की रिहाई कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के हस्तक्षेप के बाद ही संभव हो सकी।

सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी और निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने इस घटना को पहले से सोची-समझी कार्रवाई बताते हुए कहा कि यह न केवल न्यायिक अधिकारियों को डराने की कोशिश है बल्कि अदालत के अधिकारों को भी चुनौती देती है। अदालत ने टिप्पणी की कि बंगाल में राजनीतिक ध्रुवीकरण बेहद ज्यादा है और यहां तक कि अदालत के आदेशों के पालन में भी राजनीति दिखाई देती है।

कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया कि मामले की जांच एनआईए और सीबीआई को सौंपने पर विचार किया जाए तथा सभी न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए केंद्रीय बलों की तैनाती की जाए।

चुनावी माहौल में बढ़ी सियासी गर्मी

बंगाल में 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को दो चरणों में मतदान होना है, जबकि मतगणना 4 मई को होगी। चुनाव से ठीक पहले सामने आई इस घटना ने राज्य की राजनीति को और गर्मा दिया है और कानून-व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

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