अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर अंतरराष्ट्रीय राजनीति तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा सहयोग की अपील किए जाने के बाद जर्मनी ने इस मुद्दे पर साफ तौर पर दूरी बना ली है, जिससे अमेरिका की रणनीति को बड़ा झटका माना जा रहा है।
दरअसल, अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का समुद्री मार्ग प्रभावित हो गया है। बताया जा रहा है कि ईरान ने इस क्षेत्र में सैन्य तैनाती बढ़ा दी है, जिसके चलते कई देशों के व्यापारिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है। इस स्थिति का असर भारत सहित कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति और व्यापार पर भी पड़ सकता है।
NATO से जुड़ाव से जर्मनी का इनकार
अमेरिका ने इस मामले में सहयोग के लिए कई देशों से समर्थन मांगा था, लेकिन जर्मनी ने स्पष्ट कर दिया कि यह NATO का मुद्दा नहीं है। बर्लिन में जर्मन सरकार के एक प्रवक्ता ने कहा, “इस युद्ध का NATO से कोई लेना-देना नहीं है। यह NATO का युद्ध नहीं है। युद्ध से पहले भी इसमें हिस्सा लेने पर विचार नहीं किया गया था और अब भी इस पर विचार नहीं किया जा रहा है।”
जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडफुल ने भी मीडिया से बातचीत में कहा कि उन्हें स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्षेत्र में NATO सदस्य देशों की किसी भूमिका की संभावना नजर नहीं आती।
वैश्विक व्यापार पर बढ़ी चिंता
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में से एक माना जाता है, जहां से बड़ी मात्रा में तेल और गैस की सप्लाई होती है। ऐसे में क्षेत्र में तनाव बढ़ने से वैश्विक बाजार और ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।
अमेरिका की कूटनीतिक चुनौती
जर्मनी के रुख के बाद अमेरिका के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि NATO देशों का सामूहिक समर्थन नहीं मिलता, तो इस मुद्दे पर अमेरिका को सीमित सहयोग के साथ ही आगे बढ़ना पड़ सकता है।