अमेरिका ने भारत सहित 60 देशों और अर्थव्यवस्थाओं के खिलाफ एक बड़ी व्यापारिक कार्रवाई का प्रस्ताव पेश किया है। इस कदम से वैश्विक व्यापार जगत में हलचल मच गई है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (यूएसटीआर) का आरोप है कि इन देशों ने जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) से तैयार उत्पादों के आयात को रोकने के लिए प्रभावी कदम नहीं उठाए हैं। ऐसे में अमेरिका इन देशों से आने वाले उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने पर विचार कर रहा है।
भारत समेत 60 देशों पर कार्रवाई का प्रस्ताव
यूएसटीआर ने मंगलवार को जारी अपने बयान में कहा कि 1974 के अमेरिकी व्यापार कानून की धारा 301 के तहत की गई जांच में पाया गया है कि 60 देशों और अर्थव्यवस्थाओं की नीतियां अमेरिकी व्यापार और उद्योग के लिए प्रतिकूल प्रभाव पैदा कर रही हैं।
एजेंसी का कहना है कि जबरन श्रम से तैयार उत्पादों के आयात को रोकने में विफलता के कारण अमेरिकी कंपनियों और श्रमिकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसी आधार पर इन देशों के खिलाफ व्यापारिक कार्रवाई की सिफारिश की गई है।
भारत भी सूची में शामिल
जिन देशों को इस श्रेणी में रखा गया है उनमें भारत के अलावा चीन, बांग्लादेश, ऑस्ट्रेलिया, बहरीन, जापान, कुवैत, सऊदी अरब, सिंगापुर, ब्रिटेन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे प्रमुख व्यापारिक साझेदार भी शामिल हैं।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमिसन ग्रीर ने कहा कि अमेरिका के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों द्वारा जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात को रोकने में विफल रहना स्वीकार्य नहीं है. उनके अनुसार इससे अमेरिकी श्रमिकों को वैश्विक बाजार में असमान प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है.
कितना अतिरिक्त शुल्क लग सकता है?
यूएसटीआर ने जांच के आधार पर अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा है। प्रस्ताव के मुताबिक, जिन देशों ने जबरन श्रम से बने उत्पादों पर प्रतिबंध लागू कर दिया है या ऐसा करने की प्रतिबद्धता दिखाई है, उनके उत्पादों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगाया जा सकता है।
वहीं अन्य देशों के लिए 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का सुझाव दिया गया है। कपड़ा और परिधान क्षेत्र से जुड़े कुछ आयातों के लिए अलग व्यवस्था भी प्रस्तावित की गई है।
मार्च में शुरू हुई थी जांच
यूएसटीआर के अनुसार इस मामले की जांच 12 मार्च को शुरू की गई थी। जांच के दौरान लगभग 60 गवाहों के बयान दर्ज किए गए और सार्वजनिक परामर्श प्रक्रिया के तहत करीब 500 टिप्पणियां प्राप्त हुईं।
इन सभी सूचनाओं और सुझावों के विश्लेषण के बाद एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट और प्रस्तावित कार्रवाई तैयार की है।
भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता के बीच बढ़ी चिंता
यह प्रस्ताव ऐसे समय सामने आया है जब भारत और अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण को अंतिम रूप देने की दिशा में सक्रिय बातचीत कर रहे हैं। दोनों देशों के बीच हाल के महीनों में कई दौर की वार्ताएं हो चुकी हैं, जिनमें बाजार पहुंच, कृषि, शुल्क और डिजिटल व्यापार जैसे मुद्दे प्रमुख रहे हैं।
ऐसे में प्रस्तावित टैरिफ कार्रवाई व्यापार समझौते की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
ट्रंप की टैरिफ नीति फिर चर्चा में
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीति पहले भी वैश्विक स्तर पर चर्चा और विवाद का विषय रही है। इस साल की शुरुआत में भी कई देशों को उच्च शुल्क लगाने की चेतावनी दी गई थी, हालांकि बाद में बातचीत के लिए कुछ कदमों को अस्थायी रूप से रोक दिया गया था।
भारत लगातार यह कहता रहा है कि वह अपने संवेदनशील क्षेत्रों की सुरक्षा करते हुए एक संतुलित और दोनों देशों के हित में व्यापार समझौता चाहता है।
क्या पाकिस्तान को मिलेगी राहत?
यूएसटीआर द्वारा जारी जानकारी में पाकिस्तान का नाम प्रमुख रूप से सूची में सामने नहीं आया है, जिसके बाद यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या इस प्रस्तावित कार्रवाई से पाकिस्तान को छूट मिल सकती है। हालांकि अंतिम निर्णय अभी नहीं लिया गया है और अमेरिकी प्रशासन की ओर से अंतिम सूची या कार्रवाई का औपचारिक ऐलान होना बाकी है।
6 जुलाई तक मांगे गए सुझाव
यूएसटीआर ने प्रस्तावित उपायों पर 6 जुलाई तक लिखित टिप्पणियां आमंत्रित की हैं। इसके बाद 7 जुलाई को सार्वजनिक सुनवाई आयोजित की जाएगी। प्राप्त सुझावों और सुनवाई के निष्कर्षों के आधार पर आगे का फैसला लिया जाएगा।
एजेंसी ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल कोई अतिरिक्त शुल्क स्वतः लागू नहीं होगा। हालांकि यदि अमेरिकी प्रशासन आगे बढ़ने का निर्णय लेता है तो धारा 301 के तहत अतिरिक्त टैरिफ, आयात कोटा या अन्य व्यापारिक प्रतिबंध लागू किए जा सकते हैं।
अमेरिका अब भी भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार
व्यापारिक मतभेदों के बावजूद अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार बना हुआ है। दोनों देशों के बीच वस्तुओं का द्विपक्षीय व्यापार 120 अरब डॉलर से अधिक के स्तर को पार कर चुका है। दोनों सरकारें आर्थिक संबंधों को और मजबूत बनाने की प्रतिबद्धता भी दोहराती रही हैं।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जुलाई में सार्वजनिक सुनवाई और परामर्श प्रक्रिया पूरी होने के बाद अमेरिका इस प्रस्ताव पर क्या अंतिम फैसला लेता है।