नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आवारा कुत्तों (Stray Dogs) की समस्या पर सुनवाई करते हुए बुधवार (7 जनवरी, 2026) को बेहद तल्ख टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि समस्या सिर्फ कुत्तों के काटने की नहीं है, बल्कि सड़कों पर आवारा जानवरों की वजह से होने वाले जानलेवा सड़क हादसों की भी है।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने कहा, “सुबह-सुबह कौन सा कुत्ता किस मूड में होगा, यह कोई नहीं जानता। नगर निकायों को नियमों का सख्ती से पालन करना होगा।”
सुनवाई की 4 बड़ी बातें:
- जजों का दर्द (20 दिन में 2 जज शिकार):मामले की गंभीरता बताते हुए जस्टिस संदीप मेहता ने एक चौंकाने वाली जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पिछले 20 दिनों में राजस्थान हाईकोर्ट के दो जज आवारा जानवरों के कारण एक्सीडेंट का शिकार हुए हैं। इनमें से एक जज अभी भी रीढ़ की हड्डी (Spine) की चोट से जूझ रहे हैं।
- सिब्बल की दलील: ‘CSVR’ फॉर्मूला अपनाएं:याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि समाधान सभी कुत्तों को पकड़ना या हटाना नहीं है। उन्होंने CSVR (कैच, स्टरलाइज, वैक्सिनेट और रिलीज) यानी ‘पकड़ो, नसबंदी करो, टीका लगाओ और छोड़ो’ का फॉर्मूला अपनाने की बात कही, जो विश्व स्तर पर स्वीकृत है।
- NHAI और एक्सप्रेस-वे पर बाड़:न्याय मित्र (Amicus Curiae) गौरव अग्रवाल ने बताया कि NHAI ने 1,400 किमी सड़क को ‘संवेदनशील’ माना है। इस पर कोर्ट ने सुझाव दिया कि एक्सप्रेस-वे और सड़कों पर आवारा पशुओं को आने से रोकने के लिए बाड़ (Fencing) लगाई जानी चाहिए।
- UP समेत इन राज्यों को फटकार:कोर्ट ने नाराजगी जताई कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और पंजाब जैसे राज्यों ने अभी तक अपना जवाब (हलफनामा) दाखिल नहीं किया है। कोर्ट ने चेतावनी दी कि ढिलाई बरतने वाले राज्यों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
कोर्ट का रुख साफ: ‘इलाज से परहेज बेहतर’
जस्टिस नाथ ने स्पष्ट किया कि कोर्ट ने केवल ‘संस्थागत क्षेत्रों’ (जैसे स्कूल, अस्पताल) से कुत्तों को हटाने का निर्देश दिया था और वह चाहते हैं कि नागरिक निकाय अपनी जिम्मेदारी निभाएं। कोर्ट का मानना है कि ‘इलाज से परहेज बेहतर है’ (Prevention is better than cure)।