Sonam Wangchuk Hospitalized: CJP का आंदोलन नए मोड़ पर, 20 जुलाई के March और Hunger Strike पर टिकी सबकी नजर

NEET पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर चल रहा कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का आंदोलन अब नए चरण में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सोनम वांगचुक की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है। इसके बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या आंदोलन की रफ्तार धीमी पड़ेगी या फिर नए स्वरूप में आगे बढ़ेगा।

इसी बीच CJP के नेता अभिजीत दीपके ने घोषणा की है कि 20 जुलाई को प्रस्तावित मार्च निकाला जाएगा और इसके साथ भूख हड़ताल भी शुरू की जाएगी। संगठन ने स्पष्ट किया है कि सोनम वांगचुक के अस्पताल में भर्ती होने के बावजूद आंदोलन समाप्त नहीं किया जाएगा और सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश जारी रहेगी।

जनसमर्थन को लेकर उठ रहे सवाल

आंदोलन के बीच यह चर्चा भी तेज हो गई है कि जिस बड़े जनसमर्थन की उम्मीद CJP और उसके समर्थकों को थी, वह अब तक देखने को क्यों नहीं मिला। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल प्रतीकात्मक विरोध प्रदर्शनों के जरिए सरकार पर प्रभावी दबाव बनाना आसान नहीं होता। वहीं आंदोलन से जुड़े लोगों का दावा है कि समर्थन मौजूद है, लेकिन विभिन्न कारणों से लोग खुलकर सामने आने से बच रहे हैं।

विशेषज्ञ ने बताया आंदोलन का सीमित प्रभाव

राजनीतिक मामलों के जानकार एस.के. शर्मा ने एबीपी लाइव से बातचीत में कहा कि किसी भी केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा केवल कुछ लोगों की मांग के आधार पर नहीं हो सकता। उनके अनुसार सरकार संवैधानिक व्यवस्था के तहत कार्य करती है और किसी समूह के विरोध मात्र से शासन व्यवस्था में बदलाव नहीं आता।

उन्होंने कहा कि इस आंदोलन में न तो कोई स्पष्ट रणनीति दिखाई देती है और न ही ऐसा कोई संवैधानिक आधार नजर आता है, जिससे सरकार पर इस्तीफे का दबाव बनाया जा सके। उनके मुताबिक, इसे राजनीतिक दलों का प्रचार अभियान या पब्लिसिटी स्टंट कहना अधिक उचित होगा।

‘भीड़ बढ़ने से संवैधानिक व्यवस्था नहीं बदलती’

एस.के. शर्मा का कहना है कि यदि विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों की संख्या कई गुना भी बढ़ जाए, तब भी उससे संविधान या सरकार की कार्यप्रणाली स्वतः नहीं बदलती। उनके अनुसार लोकतांत्रिक व्यवस्था तय प्रक्रियाओं के अनुसार संचालित होती है और केवल धरना-प्रदर्शन या सोशल मीडिया के दबाव से किसी मंत्री का इस्तीफा नहीं कराया जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार ऐसे आंदोलनों का उद्देश्य केवल सार्वजनिक चर्चा में बने रहना होता है और उनका वास्तविक राजनीतिक प्रभाव सीमित रहता है।

दूसरे विशेषज्ञ ने रखा अलग नजरिया

वहीं राजनीतिक विश्लेषक बलविंदर सिंह ने इस पूरे घटनाक्रम को अलग दृष्टिकोण से देखा। उनका कहना है कि जनता की आवाज चाहे कुछ लोगों के माध्यम से उठे या बड़ी संख्या में, उसे लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता।

उन्होंने कहा कि कई लोग आंदोलन का समर्थन करने के बावजूद सरकारी कार्रवाई, सामाजिक बहिष्कार या आर्थिक नुकसान की आशंका के कारण खुलकर विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं होते।

20 जुलाई के मार्च पर टिकी आगे की रणनीति

बलविंदर सिंह के अनुसार, सोनम वांगचुक के अस्पताल से बाहर आने के बाद आंदोलन की अगली रणनीति तय की जाएगी और अभियान आगे भी जारी रह सकता है। फिलहाल जंतर-मंतर पर चल रहे इस आंदोलन का अगला महत्वपूर्ण चरण 20 जुलाई को प्रस्तावित मार्च और भूख हड़ताल को माना जा रहा है।

एक ओर कुछ राजनीतिक विश्लेषक इस आंदोलन को सीमित प्रभाव वाला विरोध प्रदर्शन बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आंदोलन के समर्थकों का कहना है कि उनकी मुहिम अभी खत्म नहीं हुई है। अब यह देखना अहम होगा कि सोनम वांगचुक की अनुपस्थिति में यह आंदोलन कितना प्रभावी साबित होता है।

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