बिहार में मतदाता सूची के ‘स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन’ (SIR) को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (27 मई) को अहम फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई SIR प्रक्रिया संविधान के दायरे में है और इसे गैर-संवैधानिक नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग ने अपने अधिकारों का ही इस्तेमाल किया है, किसी अतिरिक्त शक्ति का नहीं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि केवल इस आधार पर SIR प्रक्रिया को अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि यह सामान्य मतदाता सूची संशोधन प्रक्रिया से अलग है। अदालत ने इसे वैध और संवैधानिक प्रक्रिया माना।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों सही ठहराई SIR प्रक्रिया?
सुप्रीम Court ने अपने आदेश में कहा कि चुनाव आयोग को व्यापक स्तर पर मतदाता सूची की जांच और संशोधन करने का अधिकार है। अदालत के अनुसार, इतनी बड़ी प्रक्रिया को लागू करने के लिए आयोग को नियम और प्रक्रिया तय करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा, “चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया है, अपनी शक्तियों के बाहर नहीं. पूरी प्रक्रिया को गैर-संवैधानिक करार नहीं दे सकते.”
अदालत ने यह भी माना कि SIR प्रक्रिया संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act) की कसौटी पर खरी उतरती है।
नाम काटने पर भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान यह दलील दी गई थी कि SIR प्रक्रिया में मतदाताओं पर खुद को साबित करने का अतिरिक्त बोझ डाला गया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपने पुराने पते से अलग स्थान पर रह रहा है, तब भी उसका या उसके परिवार का रिकॉर्ड पुराने डेटा में मौजूद हो सकता है।
कोर्ट ने कहा, “SIR में नाम कटने को नियम विरुद्ध नहीं कहा जा सकता.”
साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि दस्तावेजों की विश्वसनीयता के आधार पर चुनाव आयोग द्वारा निर्णय लेना मनमाना नहीं माना जा सकता।
क्या चुनाव आयोग नागरिकता तय कर रहा है?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर भी स्पष्ट टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग नागरिकता तय नहीं करता, बल्कि केवल मतदाता सूची की वैधता सुनिश्चित करता है। यदि किसी व्यक्ति के दस्तावेज संदिग्ध लगते हैं, तो आयोग उसका मामला केंद्र सरकार को भेज सकता है।
कोर्ट ने कहा, “इसका मतलब यह नहीं लगा सकते कि चुनाव आयोग लोगों की नागरिकता तय कर रहा है.”
याचिकाकर्ताओं ने क्या उठाए थे सवाल?
इस मामले में दायर याचिकाओं में कहा गया था कि चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मिली शक्तियों से आगे जाती है। याचिकाकर्ताओं ने विशेष रूप से उस शर्त पर आपत्ति जताई थी, जिसमें 2002 या 2003 की मतदाता सूची में नाम न होने पर नागरिकता साबित करने की जरूरत बताई गई थी।
याचिकाओं में कहा गया कि ऐसे मतदाताओं को अपने पैतृक संबंध भी साबित करने पड़ रहे हैं, जिनका नाम उस समय की वोटर लिस्ट में दर्ज था।
लंबी सुनवाई के बाद आया फैसला
इस संवेदनशील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने लंबी सुनवाई के बाद पहले ही फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब अदालत के अंतिम निर्णय के साथ चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को बड़ी कानूनी राहत मिल गई है।