
नागरिकता कानून 1955 को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को केंद्र सरकार को 1971 के बाद असम और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों में अवैध रूप से आने वाले प्रावासियों के आंकड़े उपलब्ध करवाने के निर्देश दिया है।असम में इन दिनों इ कानून की धारा 6ए को लेकर काफी बहस चल रही है। मंगलवार को सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ और चार अन्य जजों की बेंच मामले की सुनवाई कर रही थी। कई याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में सीटिजनशिप ऐक्ट 1955 की धारा 6ए को चुनौती दी थी। वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने असम को लेकर बड़ा दावा किया और कहा कि यह म्यांमार की हिस्सा हुआ करता था। सिब्बल के दावे पर असम सरकार की भी प्रतिक्रिया सामने आई है। सरकार के प्रवक्ता पियूष हजारिका ने कहा है कि महाभारत काल से ही असम भारतवर्ष का हिस्सा था।
धारा 6ए में कुछ विदेशी प्रवासियों को नागरिकता के लिए आवेदन करने का अधिकार दिया गया है। ये वे प्रवासी हैं जो कि 1966 से 1971 के बीच असम में आए थे। मामले की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अपने तर्क रखे। उन्होंने इतिहास की बात करते हुए कहा कि उन लोगों की पहचान करना बहुत मुश्किल काम है। उन्होंने कहा कि ब्रिटिश शासनकाल में असम म्यांमार का हिस्सा था और इसके बाद वह बंटवारे के बाद पूर्वी बंगाल से जुड़ा था। इस तरह से असम में बंगाली पॉपुलेशन भी रहती है।
उन्होंने कहा, इतिहास में भी लोगों का असम में आना जाना लगा रहा है और इसको अलग से मैप नहीं किया जा सकता। अगर आप असम का इतिहास देखें यही लगेगा कि असम में आने वालों के बारे में पता लगाना बेहद मुश्किल है। उन्होंने कहा, अगर 1824 से पहले की बात करें तो असम म्यांमार क् हिस्सा था। इसके बाद जब ब्रिटिश लोगों ने जीत हासिल की तो संधि समझौते के तहत इसे ब्रिटिशर्स को सौंप दिया गया। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि उस समय वहां के लोग ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ किस तरह का प्रदर्शन कर सकते थे।
उन्होंने कहा, कुल मिलाकर इस विवाद का एक ही मूल है कि जो लोग सेक्शन 6ए का यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि यह बांग्लादेश से आने वाले घुसपैठिकों को वैध कर रही है, वे राज्य की डेमोग्राफी और संस्कृति के साथ खिलवाड़ करना चाहते हैं। सीजेआई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ में जस्टिस एएस बोपन्ना, एमएम सुंदरेश, जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे।