नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने खजुराहो के प्रसिद्ध जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति के पुनर्निर्माण और पुन:प्रतिष्ठा की मांग वाली याचिका को मंगलवार (16 सितंबर) को खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इसे “पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन” बताते हुए कहा कि ऐतिहासिक धरोहरों में किसी भी तरह का बदलाव नहीं किया जा सकता, केवल संरक्षण ही संभव है।
CJI गवई ने क्या कहा?
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस गवई ने सख्त लहजे में कहा:
“यह पूरी तरह से पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन है। जाइए और खुद भगवान से कहिए कि वही कुछ करें। आप भगवान विष्णु के प्रबल भक्त हैं, तो प्रार्थना कीजिए और ध्यान कीजिए।”
उन्होंने यह भी साफ किया कि किसी मूर्ति को बदला जा सकता है या नहीं, यह निर्णय केवल अर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) के अधिकार क्षेत्र में आता है।
किसने लगाई थी याचिका?
यह याचिका राकेश दलाल नामक व्यक्ति ने दायर की थी। उनका कहना था कि जावरी मंदिर की मूर्ति मुगल आक्रमण के दौरान खंडित हुई थी और आजादी के 77 साल बाद भी इसे पुनर्स्थापित नहीं किया गया। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में क्षतिग्रस्त मूर्ति की तस्वीर पेश करते हुए दलील दी कि इससे श्रद्धालुओं के पूजा-अधिकार का हनन हो रहा है।
इस पर सीजेआई गवई ने टिप्पणी की:
“अगर आप शैव मत से परहेज नहीं करते तो वहां शिवलिंग की पूजा कीजिए।”
ASI और UNESCO के नियम
ASI के नियमों के मुताबिक, किसी भी संरक्षित स्मारक या मंदिर में मूर्तियों को बदलना वर्जित है। टूटी हुई मूर्ति भी ऐतिहासिक महत्व रखती है और उसे उसी रूप में संरक्षित किया जाता है।
खजुराहो यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट में शामिल है। ऐसे स्थलों पर किसी भी बदलाव की अनुमति भारतीय सरकार के साथ-साथ यूनेस्को से भी लेनी पड़ती है। इसलिए मूर्ति का पुनर्निर्माण या प्रतिस्थापन संभव नहीं है।