दूसरे राज्यों में अपना असर बढ़ाने की गरज के चलते सपा अपने कांग्रेस के साथ गठबंधन को और मजबूती देना चाहती है। उसकी निगाह महाराष्ट्र व हरियाणा में होने वाले विधानसभा चुनाव पर हैं, जहां वह कांग्रेस से कुछ सीटें चाहती हैं।इसके एवज में अगर उसे विधानसभा उपचुनाव में बड़ा दिल दिखाना पड़े तो वह इसके लिए भी तैयार है। लोकसभा में सीटों के लिहाज से सपा देश की तीसरी राष्ट्रीय पार्टी तो है ही, साथ ही वोट प्रतिशत के लिहाज से उसने भाजपा, कांग्रेस के बाद देश भर में सबसे ज्यादा वोट पाए हैं। इस कामयाबी के बावजूद सपा को इस बात का मलाल है कि वह अभी भी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने की मंजिल से दूर है।उसकी कामयाबी केवल यूपी तक ही सीमित है जबकि राष्ट्रीय पार्टी के लिए दूसरे राज्यों में सीट व वोट प्रतिशत बढ़ाने की जरूरी शर्त अभी तक पूरी नहीं की है। इसलिए सपा की चाहत है कि कांग्रेस गठबंधन के साथ उसे दूसरे राज्यों में अपना असर बढ़ाने का मौका मिल सकता है। इसीलिए वह महाराष्ट्र व हरियाणा में 20-20 विधानसभा सीटें लड़ने की तैयारी कर रही है लेकिन इससे पहले यूपी की दस सीटों पर विधानसभा उपचुनाव होना है। यहां कांग्रेस चाहती है कि उसे लड़ने के लिए सपा चार सीटें दे। खास तौर पर गाजियाबाद व मीरापुर उसका खास जोर है।कांग्रेस व सपा दोनों को साथ रहने को तैयारकांग्रेस को जहां सपा के जरिए यूपी में छह सीटें जीतने का मौका मिला तो सपा को भी कांग्रेस के साथ आने से उसका पीडीए का दांव ज्यादा कारगर रहा। यही कारण है कि गठबंधन से सपा व कांग्रेस को दोनों को फायदा हुआ और दोनों दलों का शीर्ष नेतृत्व इसे अगले विधानसभा चुनाव में आजमाना चाहते हैं।लोकसभा में राहुल व अखिलेश के बीच दिखा समन्वयलोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी व सपा दल के नेता अखिलेश यादव दोनों के बीच बेहतर समन्वय दिखा। सपा ने जब लोकसभा उपाध्यक्ष पद के लिए फैजाबाद से अपने सांसद अवधेश प्रसाद का नाम आगे किया तो टीएमसी के साथ ही कांग्रेस ने भी इस पर सहमति जता दी। यह सपा की बड़ी कामयाबी मानी जा रही है। खास बात यह कि 2017 में जब यूपी विधानसभा चुनाव में सपा सत्ता से बाहर हो गई तो उसके साथ ही कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन टूट गया। इसी तरह बसपा के साथ सपा ने 2019 में गठजोड़ किया। यह भी नतीजे आने के बाद बिखरने लगा।दूसरे राज्यों में अपना असर बढ़ाएगी सपा, बड़ा दिल दिखा कर गठबंधन को और मजबूती देंगे अखिलेश
दूसरे राज्यों में अपना असर बढ़ाने की गरज के चलते सपा अपने कांग्रेस के साथ गठबंधन को और मजबूती देना चाहती है। उसकी निगाह महाराष्ट्र व हरियाणा में होने वाले विधानसभा चुनाव पर हैं, जहां वह कांग्रेस से कुछ सीटें चाहती हैं।इसके एवज में अगर उसे विधानसभा उपचुनाव में बड़ा दिल दिखाना पड़े तो वह इसके लिए भी तैयार है। लोकसभा में सीटों के लिहाज से सपा देश की तीसरी राष्ट्रीय पार्टी तो है ही, साथ ही वोट प्रतिशत के लिहाज से उसने भाजपा, कांग्रेस के बाद देश भर में सबसे ज्यादा वोट पाए हैं। इस कामयाबी के बावजूद सपा को इस बात का मलाल है कि वह अभी भी राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने की मंजिल से दूर है।उसकी कामयाबी केवल यूपी तक ही सीमित है जबकि राष्ट्रीय पार्टी के लिए दूसरे राज्यों में सीट व वोट प्रतिशत बढ़ाने की जरूरी शर्त अभी तक पूरी नहीं की है। इसलिए सपा की चाहत है कि कांग्रेस गठबंधन के साथ उसे दूसरे राज्यों में अपना असर बढ़ाने का मौका मिल सकता है। इसीलिए वह महाराष्ट्र व हरियाणा में 20-20 विधानसभा सीटें लड़ने की तैयारी कर रही है लेकिन इससे पहले यूपी की दस सीटों पर विधानसभा उपचुनाव होना है। यहां कांग्रेस चाहती है कि उसे लड़ने के लिए सपा चार सीटें दे। खास तौर पर गाजियाबाद व मीरापुर उसका खास जोर है।कांग्रेस व सपा दोनों को साथ रहने को तैयारकांग्रेस को जहां सपा के जरिए यूपी में छह सीटें जीतने का मौका मिला तो सपा को भी कांग्रेस के साथ आने से उसका पीडीए का दांव ज्यादा कारगर रहा। यही कारण है कि गठबंधन से सपा व कांग्रेस को दोनों को फायदा हुआ और दोनों दलों का शीर्ष नेतृत्व इसे अगले विधानसभा चुनाव में आजमाना चाहते हैं।लोकसभा में राहुल व अखिलेश के बीच दिखा समन्वयलोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी व सपा दल के नेता अखिलेश यादव दोनों के बीच बेहतर समन्वय दिखा। सपा ने जब लोकसभा उपाध्यक्ष पद के लिए फैजाबाद से अपने सांसद अवधेश प्रसाद का नाम आगे किया तो टीएमसी के साथ ही कांग्रेस ने भी इस पर सहमति जता दी। यह सपा की बड़ी कामयाबी मानी जा रही है। खास बात यह कि 2017 में जब यूपी विधानसभा चुनाव में सपा सत्ता से बाहर हो गई तो उसके साथ ही कांग्रेस के साथ उसका गठबंधन टूट गया। इसी तरह बसपा के साथ सपा ने 2019 में गठजोड़ किया। यह भी नतीजे आने के बाद बिखरने लगा।