
5 अगस्त, 2019, चार साल पहले जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 खत्म किया गया, तब काफी हंगामा मचा। कश्मीर की तमाम क्षेत्रीय पार्टियों से लेकर कांग्रेस तक ने विरोध किया।इसी दौरान, घाटी में आईएएस अधिकारी शाह फैसल भी चर्चा में आ गए, जिन्होंने नौकरी छोड़कर एक दल का गठन किया। इसमें उन्हें जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी की पूर्व छात्रा शेहला रशीद का भी साथ मिला। जम्मू-कश्मीर पीपल्स मूवमेंट नामक पार्टी के गठन के बाद शाह फैसल ने केंद्र सरकार के अनुच्छेद-370 हटाए जाने के फैसले का जमकर विरोध जताया। 14 अगस्त, 2019 को विदेश जाने के दौरान उन्हें दिल्ली एयरपोर्ट से हिरासत में लेकर घर में नजरबंद कर दिया गया। पीएसए के तहत हुई कार्रवाई के बाद शाह फैसल काफी समय तक चर्चाओं से बाहर रहे। आखिरकार अचानक 2022 में उन्होंने राजनीति को दूर से ही नमस्कर करते हुए वापस प्रशासनिक सेवा में चले गए। राजनीति से दूरी बनाने के बाद फैसल कई बार केंद्र सरकार के फैसले की तारीफ कर चुके हैं। इसी तरह जेएनयू की पूर्व स्टूडेंट शेहला रशीद और हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकी मट्टू के भाई द्वारा की गई केंद्र सरकार की तारीफ से लोग आश्चर्यचकित हो गए हैं।
आतंकी के भाई ने लहराया तिरंगा, रशीद ने सरकार की तारीफ की
स्वतंत्रता दिवस के चंद दिनों पहले जावेद मट्टू के भाई रईस मट्टू ने घाटी में बने अपने घर के बाहर से तिरंगा लहराया। उसने कहा कि इसके पीछे कोई भी दबाव नहीं था और अपने दिल से ही उसने तिरंगा लहराया है। जम्मू-कश्मीर को लेकर मट्टू ने दावा किया कि अब यहां विकास हो रहा है। पहली बार 14 अगस्त को अपनी दुकान पर बैठा हूं, वर्ना इस दौरान दो से तीन दिनों तक दुकानें बंद रहती थीं। पहले के राजनीतिक दल गेम खेल रहे थे, लेकिन अब इंसाफ हो रहा है। उसने अपने आतंकी भाई से भी आतंक का रास्ता छोड़ने की अपील की। वहीं, शेहला रशीद द्वारा मंगलवार को किए गए दो ट्वीट के बाद तमाम विपक्षी दलों में खलबली मच गई। जो शेहला रशीद जेएनयू में पढ़ाई से लेकर हाल के समय तक मोदी सरकार के कामकाज का जमकर विरोध करती रही थीं, वह एकाएक प्रशंसा करने लगीं। उन्होंने एक ट्वीट में कहा, ”इस बात को स्वीकार करना भले ही असुविधाजनक हो, लेकिन कश्मीर में पीएम नरेंद्र मोदी और एलजी मनोज सिन्हा के कार्यकाल में मानवाधिकार रिकॉर्ड में सुधार हुआ है। सरकार ने लोगों की जिंदगियों को बचाने में मदद की है। यह मेरा मानना है।” इसके अलावा, एक अन्य ट्वीट में रशीद ने कहा कि वर्तमान सरकार दशकों से चले आ रहे कश्मीरियों के पहचान के संकट को खत्म करने में कामयाब रही है। क्या यह आर्टिकल 370 को हटाए जाने का नतीजा है? अब शायद और खून-खराबा नहीं होगा।370 के खत्म होने के बाद घाटी में वाकई बदलाव हो रहा?
यह साफ है कि 2019 में अनुच्छेद-370 हटाए जाने के बाद घाटी में काफी कुछ बदल गया। वहां की फिजा पहले की तुलना में अब बदली-बदली नजर आने लगी है। पहले आए दिन पत्थरबाजी की घटनाएं सामने आती थीं, जिसमें अब काफी कमी आ गई। पिछले दिनों मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को दिए हलफनामे में बताया है कि जो पथराव की घटनाएं 2018 में 1767 तक पहुंच गई थीं, वह अब शून्य पर आ गई हैं। इसके अलावा, 2018 से 2022 के बीच आतंकी घटनाओं में भी 45 फीसदी से अधिक की कमी दर्ज की गई है। कश्मीर में अनुच्छेद 370 खत्म होने के बाद पर्यटकों में भी काफी उत्साह है। पिछले कुछ सालों में पर्यटकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। पिछले साल 1.88 करोड़ सैलानियों ने जम्मू-कश्मीर पहुंचकर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई। इस साल यह आंकड़ा दो करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है। वहीं, स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पहले जहां घाटी में हाई सिक्योरिटी रहती थी, वहीं अब लोग तिरंगा लेकर रैलियां निकाल रहे हैं। मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं भी बंद नहीं की जा रही हैं, जोकि अनुच्छेद 370 के पहले कई बार बंद रहती थीं। कश्मीर के प्रशासन का वहां की जनता से काफी अधिक लगाव बढ़ा है। इसमें एलजी मनोज सिन्हा का भी योगदान माना जाता है। वे लगातार कश्मीर में विकास की परियोजनाओं को लागू कर रहे हैं, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर तलाश रहे हैं। इससे जनता का विश्वास वहां के प्रशासन पर काफी बढ़ा है।
चुनाव में देरी की वजह से भी शेहला, शाह फैसल ने बदली रणनीति?
जम्मू-कश्मीर में पिछली बार 2014 में विधानसभा के चुनाव हुए थे, जिसके बाद बीजेपी और पीडीपी ने गठबंधन की सरकार बनाई थी। हालांकि, सरकार ने कार्यकाल पूरा नहीं किया और फिर अलायंस बीच में ही टूट गया। इसके बाद से ही पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस, कांग्रेस समेत तमाम दल जम्मू-कश्मीर में चुनाव करवाने की मांग कर चुके हैं। उम्मीद जताई जा रही है कि अगले लोकसभा चुनवा के साथ ही वहां विधानसभा चुनाव भी करवाए जा सकते हैं। राजनैतिक जानकारों की मानें तो पहले शाह फैसल और फिर शेहला रशीद के स्टैंड में आए बदलाव के पीछे की तमाम वजहों में से एक जम्मू-कश्मीर में चुनाव न होना भी है। फैसल और शेहला ने जब पार्टी बनाई तो उन्हें उम्मीद थी कि वे चुनाव लड़कर विधानसभा तक पहुंच सकते हैं, जिसके बाद वे राजनैतिक रूप से और सक्रीय होकर घाटी की जनता के लिए लड़ाई लड़ सकेंगे। लेकिन सालों से चुनाव न होने की वजह से शेहला और फैसल के पास राजनीति से दूर होने के सिवा कोई अन्य चारा भी नहीं बचा। इसी वजह से शाह वापस प्रशासनिक सेवा में लौट गए, जबकि शेहला रशीद का भी अंदाज बदला-बदला नजर आने लगा है।