नई दिल्ली। कुछ रिपोर्ट्स में यह दावा किया गया कि भारतीय तेल कंपनियों ने अमेरिका के प्रतिबंधों के डर से रूस से कच्चा तेल खरीदना अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। लेकिन इस पर विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट प्रतिक्रिया दी है। मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि उन्हें इस विषय में कोई खास जानकारी नहीं है। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारत की ऊर्जा नीति पूरी तरह पारदर्शी और अपने राष्ट्रीय हितों पर आधारित है।
MEA प्रवक्ता की दो टूक: पारदर्शी है भारत की ऊर्जा नीति
रणधीर जायसवाल ने शुक्रवार को एक प्रेस वार्ता में कहा, “हमें तेल खरीद से संबंधित किसी विशेष मामले की जानकारी नहीं है। हमारी ऊर्जा नीति हमारे आर्थिक और सामरिक हितों को देखते हुए तय होती है। हम हर उस विकल्प पर विचार करते हैं जो देशहित में हो।”
अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंधों का असर?
दरअसल, अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा जुलाई 2025 में यह चेतावनी दी गई थी कि यदि रूस-यूक्रेन के बीच कोई शांति समझौता नहीं हुआ तो रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100% टैरिफ लगाया जाएगा। उन्होंने भारत पर पहले ही 25% शुल्क की घोषणा कर दी थी। इसके साथ ही ईरानी मूल के पेट्रोकेमिकल उत्पादों की खरीद-बिक्री को लेकर 6 भारतीय कंपनियों पर भी अमेरिकी प्रतिबंध लगाए गए हैं।
रिफाइनरियों ने खरीद बंद की?
रॉयटर्स और अन्य अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों ने सूत्रों के हवाले से दावा किया कि इंडियन ऑयल, एचपीसीएल, बीपीसीएल और एमआरपीएल जैसी सरकारी तेल कंपनियों ने बीते सप्ताह से रूस से तेल खरीद बंद कर दी है। हाल ही में रूस की ओर से दी जा रही रियायत भी घट गई है, जो अब महज 3 डॉलर प्रति बैरल रह गई है—जो 2022 के मुकाबले सबसे कम है।
भारत की तेल रणनीति में बदलाव?
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है और रूस, यूक्रेन युद्ध के बाद से भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बन चुका है। मई 2025 में भारत ने प्रतिदिन 1.96 मिलियन बैरल रूसी तेल आयात किया था। हालांकि अब सरकारी कंपनियां अबू धाबी और पश्चिम अफ्रीका से तेल खरीद की दिशा में रुख कर रही हैं।
निजी कंपनियों का रुख अभी भी रूस की ओर
रिलायंस इंडस्ट्रीज और नायरा एनर्जी जैसी निजी कंपनियां—जिनमें रूसी कंपनी रोसनेफ्ट की हिस्सेदारी है—अभी भी रूस से कच्चा तेल खरीद रही हैं। इससे संकेत मिलता है कि सरकारी और निजी क्षेत्र की रणनीतियों में फिलहाल अंतर बना हुआ है।