संसद के मानसून सत्र से पहले आयोजित सर्वदलीय बैठक में डीलिमिटेशन (परिसीमन) बिल को लेकर डीएमके (DMK) का रुख चर्चा का केंद्र बन गया। बैठक के बाद आरएसपी सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने दावा किया कि डीएमके ने परिसीमन विधेयक का समर्थन किया है। हालांकि, पार्टी ने इस दावे पर पूरी तरह सहमति नहीं जताई और कहा कि केंद्र सरकार की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट प्रस्ताव सामने नहीं आया है।
डीएमके सांसद तिरुची शिवा ने स्पष्ट किया कि सरकार ने अब तक डीलिमिटेशन बिल का अंतिम मसौदा पेश नहीं किया है। ऐसे में पार्टी किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले सरकार से विस्तृत और स्पष्ट जानकारी चाहती है।
महिला आरक्षण को परिसीमन से अलग लागू करने की मांग
सूत्रों के अनुसार, सर्वदलीय बैठक में डीएमके ने यह भी मांग रखी कि महिला आरक्षण को मौजूदा लोकसभा सीटों की संख्या के आधार पर तत्काल लागू किया जाए। पार्टी का मानना है कि महिला आरक्षण को परिसीमन प्रक्रिया से जोड़ने की आवश्यकता नहीं है और इसे अलग से लागू किया जा सकता है।
दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों से समझौता नहीं
डीएमके ने साफ संकेत दिए हैं कि नए परिसीमन में दक्षिण भारत के राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी प्रभावित नहीं होनी चाहिए। पार्टी का कहना है कि जब तक सरकार अपना स्पष्ट प्रस्ताव सामने नहीं रखती, तब तक वह अंतिम फैसला नहीं लेगी।
सूत्रों के मुताबिक, यदि नए परिसीमन से दक्षिण भारतीय राज्यों का प्रतिनिधित्व कम होने की आशंका रहती है, तो परिसीमन प्रक्रिया को अगले 25 वर्षों तक स्थगित (फ्रीज) करने के विकल्प पर भी विचार किया जाना चाहिए।
लोकसभा सीटों में 50 फीसदी बढ़ोतरी की मांग
पार्टी की एक प्रमुख मांग यह भी है कि प्रस्तावित विधेयक में लोकसभा सीटों की संख्या में 50 प्रतिशत वृद्धि का स्पष्ट प्रावधान शामिल किया जाए। डीएमके का कहना है कि गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में इस संबंध में मौखिक आश्वासन दिया था और यदि इसे विधेयक का हिस्सा बनाया जाता है, तो पार्टी इस पर सकारात्मक रुख अपना सकती है।
फिलहाल सरकार ने पेश नहीं किया है डीलिमिटेशन बिल
अब तक केंद्र सरकार ने मानसून सत्र के लिए जारी विधायी कार्यसूची में डीलिमिटेशन बिल को शामिल नहीं किया है। हालांकि, सरकारी सूत्रों का कहना है कि उचित समय आने पर सरकार के पास इस विधेयक को पारित कराने के लिए पर्याप्त समर्थन मौजूद रहेगा।
बदला DMK का राजनीतिक रुख, संसद के समीकरणों पर नजर
पिछले कुछ महीनों के दौरान डीलिमिटेशन बिल को लेकर डीएमके का रुख पहले की तुलना में नरम माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि पार्टी का रुख सकारात्मक रहता है, तो संविधान संशोधन के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रहे बीजेपी नेतृत्व वाले एनडीए को इसका लाभ मिल सकता है।
कांग्रेस से दूरी, तमिलनाडु के हितों को प्राथमिकता
तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में सत्ता गंवाने और INDIA गठबंधन से अलग होने के बाद डीएमके और कांग्रेस के रिश्तों में दूरी बढ़ी है। अब पार्टी ने संकेत दिए हैं कि डीलिमिटेशन बिल पर उसका फैसला कांग्रेस के रुख के आधार पर नहीं, बल्कि तमिलनाडु और दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।