PDA का मतलब परिवार दल अलायंस.., कांशीराम जयंती पर अखिलेश के ऐलान से भड़की BSP, गिनाए सपा सरकार के पुराने पाप

उत्तर प्रदेश में बहुजन नायक कांशीराम की जयंती को समाजवादी पार्टी (SP) द्वारा ‘PDA दिवस’ के रूप में मनाने के अखिलेश यादव के ऐलान के बाद सियासी घमासान चरम पर पहुंच गया है। इस घोषणा पर बसपा सुप्रीमो मायावती की तीखी प्रतिक्रिया के बाद अब बहुजन समाज पार्टी (BSP) पूरी तरह से आक्रामक हो गई है और उसने सपा के ‘PDA’ की एक नई ही परिभाषा गढ़ दी है।

‘कांशीराम नगर का नाम बदला, छुट्टी रद्द की… अब ये ड्रामा क्यों?’

बसपा के प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने समाजवादी पार्टी पर तीखा प्रहार करते हुए उनके पुराने कार्यकालों की याद दिलाई:

  • छुट्टी रद्द करना: उन्होंने आरोप लगाया कि जब यूपी में सपा की सरकार थी, तब मान्यवर कांशीराम की जयंती पर घोषित सार्वजनिक अवकाश को जानबूझकर निरस्त कर दिया गया था।
  • जिले का नाम बदला: बहन जी (मायावती) द्वारा बनाए गए जिले “मान्यवर श्री कांशीराम नगर” का नाम भी सपा सरकार ने बदल दिया था।
  • योजनाएं बंद कीं: कांशीराम जी के नाम पर चल रही कई अहम जनकल्याणकारी योजनाओं को भी सपा राज में बंद कर दिया गया था।
  • विश्वनाथ पाल ने तीखा सवाल उठाया कि जो पार्टी कांशीराम जी के नाम से बने जिले को बर्दाश्त नहीं कर पाई, वह आज अचानक उनकी विचारधारा को कैसे लागू करेगी?

सपा के PDA का असली मतलब ‘परिवार दल अलायंस’

बसपा प्रदेश अध्यक्ष ने अखिलेश यादव के ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) नारे पर करारा तंज कसते हुए कहा कि असल में सपा के लिए इसका मतलब “परिवार दल अलायंस” है। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा में सिर्फ परिवारवाद हावी है और हालिया लोकसभा चुनावों में भी ज्यादातर टिकट परिवार के लोगों को ही बांटे गए। उन्होंने कहा कि बहुजन समाज अब जागरूक हो चुका है और वह सपा की इस ‘ड्रामेबाजी’ में बिल्कुल नहीं फंसने वाला।

बसपा की 2027 की तैयारी और ‘हिस्सेदारी’ का फॉर्मूला

  • अकेले लड़ी लड़ाई: पाल ने दावा किया कि 2024 के लोकसभा चुनाव में एक तरफ 38 दलों का NDA था और दूसरी तरफ 28 दलों का INDIA गठबंधन, फिर भी अकेले चुनाव लड़कर बसपा ने अंबेडकर नगर, लालगंज, चंदौली और बांदा जैसी सीटों पर मजबूती से 2 से 2.5 लाख तक वोट हासिल किए।
  • जिसकी जितनी संख्या भारी… : भाजपा द्वारा अयोध्या में PDA समाज से जिलाध्यक्ष बनाए जाने के सवाल पर उन्होंने स्पष्ट किया कि समाज के हर वर्ग को भागीदारी मिलनी ही चाहिए। इसकी शुरुआत सबसे पहले बसपा ने ही “जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” के ऐतिहासिक सिद्धांत के साथ की थी।

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