भारतीय फुटबॉल में भूचाल, सुनील छेत्री ने FIFA से मांगी मदद तो केजरीवाल बोले- खेल को राजनीति नहीं, ईमानदारी चाहिए

नई दिल्ली: भारतीय फुटबॉल के इतिहास में यह सबसे मुश्किल दौर साबित हो रहा है। साल 2026 का आगाज हो चुका है, लेकिन इंडियन सुपर लीग (ISL) का 2025-26 सीजन अब तक शुरू नहीं हो सका है। जुलाई 2025 से अनिश्चितकाल के लिए स्थगित पड़ी इस लीग के कारण खिलाड़ियों और कोचों का भविष्य अधर में लटका हुआ है। इस गंभीर संकट के बीच आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने खिलाड़ियों के समर्थन में आवाज उठाई है और खेल प्रशासन में चल रही राजनीति पर तीखा हमला बोला है।

सुनील छेत्री सहित दिग्गजों ने लगाई फीफा से गुहार

हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि भारतीय फुटबॉल के पोस्टर बॉय और कप्तान सुनील छेत्री, गोलकीपर गुरप्रीत सिंह संधू और डिफेंडर संदेश झिंगन जैसे कद्दावर खिलाड़ियों को सामने आना पड़ा है। 2 जनवरी 2026 को इन भारतीय सितारों ने विदेशी खिलाड़ी ह्यूगो बुमूस के साथ मिलकर एक संयुक्त वीडियो जारी किया। इसमें उन्होंने हताशा व्यक्त करते हुए सीधे वैश्विक संस्था फीफा (FIFA) से हस्तक्षेप करने की अपील की है। प्रशासनिक नाकामी के चलते कई क्लब दिवालिया होने की कगार पर हैं और विदेशी खिलाड़ी भारत छोड़कर जा रहे हैं, जबकि घरेलू खिलाड़ियों के सामने आर्थिक संकट गहरा गया है।

केजरीवाल बोले- यह सालों की बदइंतज़ामी का नतीजा

इस पूरे घटनाक्रम पर अरविंद केजरीवाल ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने ट्वीट करते हुए लिखा कि भारतीय फुटबॉल आज ऐसे नाज़ुक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ अगर अब भी सही और ईमानदार फैसले नहीं लिए गए, तो आने वाले सालों में यह खेल पूरी तरह बर्बादी की ओर चला जाएगा. और जब खिलाड़ियों को खेल बचाने के लिए फीफा और सरकार से अपील करनी पड़े, तो यह सालों की बदइंतज़ामी और उपेक्षा का नतीजा है. केजरीवाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि खेल को राजनीति और पावर स्ट्रगल नहीं, बल्कि पारदर्शी गवर्नेंस, जवाबदेही और खिलाड़ियों के सम्मान की ज़रूरत है.

केंद्र सरकार की चुप्पी पर उठे सवाल

केजरीवाल के बयान ने खेल प्रेमियों की उस निराशा को स्वर दिया है जो प्रशासनिक राजनीति के कारण स्टेडियमों को खाली देख रहे हैं। सवाल उठाया जा रहा है कि केंद्र सरकार कब तक इस मामले पर आंखें मूंदे रहेगी? आज स्थिति यह है कि आईसीएल के साथ-साथ आई-लीग और अन्य प्रतियोगिताएं भी ठप हैं। खिलाड़ी कोई विशेष मांग नहीं कर रहे, वे सिर्फ अपना खेलने का हक और सम्मान चाहते हैं, जिसे सत्ता के खेल ने उनसे छीन लिया है।

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