
मंगलवार दोपहर को राज्यसभा में मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों की नियुक्ति के लिए लाए गए विधेयक पर खूब हंगामा हुआ। विवादास्पद मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं पदावधि) विधेयक 2023 पर चर्चा के दौरान विपक्ष के एक सांसद ने इसे ‘अघोषित आपातकाल’ बताया।इसको लेकर राज्यसभा में सदन के नेता पीयूष गोयल ने सांसद की आलोचना की। बिल पर बोलते हुए बिहार से राजद के राज्यसभा सांसद अमरेंद्र धारी सिंह ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद इस बिल का पारित होना भारत के “चुनाव प्राधिकरण के ताबूत में एक और कील” ठोकने जैसा होगा। उन्होंने कहा, “आपातकाल की बात करते हैं, आज हमारे पास एक अघोषित आपातकाल है जो मैडम इंदिरा गांधी द्वारा किए गए आपातकाल से भी बदतर है।”जवाब में, पीयूष गोयल ने उनकी आलोचना करते हुए कहा कि आज की तुलना आपातकाल के काले दिनों से करना राष्ट्रीय जनता दल (राजद) पार्टी की सोच पर एक “धब्बा” है। गोयल ने कहा कि उन्हें यकीन नहीं हो रहा कि अमरेंद्र धारी सिंह भारत की तुलना इतिहास के उस समय से कर रहे हैं जो भारत में पूरी तरह से “असंवैधानिक, अनुचित और लोकतंत्र पर हमला” था। उन्होंने कहा, “आज हम इस सदन में बड़ी आजादी से अपनी बात रख पाते हैं, आज लोकतंत्र की आजादी है, बोलने की आजादी है, मीडिया जीवंत है। न्यायपालिका भारत में लोगों के हितों की रक्षा कर रही है।” गोयल ने कहा, “आज सलाखों के पीछे एकमात्र लोग अपराधी हैं, जिनके घरों में आपको 353 करोड़ रुपये मिलते हैं… सलाखों के पीछे एकमात्र लोग हत्यारे और भू-माफिया और शराब माफिया और हथियार डीलर और रक्षा डीलर हैं।”
गोयल ने लोकनायक जयप्रकाश नारायण और बिहार के उन हजारों लोगों के काम का भी जिक्र किया, जिन्होंने भारत में इंदिरा गांधी के शासनकाल के दौरान आपातकाल के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उन्होंने कहा कि उन्हें विश्वास नहीं हो रहा है कि यह बात “बिहार के एक व्यक्ति” से सुन रहे हैं। नाराज राज्यसभा सांसद मनोज झा ने भी स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी के सदस्य अमरेंद्र धारी सिंह द्वारा की गई टिप्पणी “प्रतीकात्मक” थी। मनोज झा ने कहा, “अगर रूपक बयानों की अनुमति नहीं है, तो किस तरह का लोकतंत्र है? मेरा मतलब है, आप नई इमारतें बनाते हैं लेकिन लोकतांत्रिक चर्चा का कोई विचार नहीं है।”
क्या कहता है ये बिल
राज्यसभा में ‘मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त विधेयक, 2023’ पर चर्चा हो रही है। इस विधेयक का उद्देश्य पिछले चुनाव आयोग अधिनियम 1991 को रिप्लेस करना है। इस विधेयक को लेकर विपक्ष हमलावर है। विपक्षी दलों का दावा है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के महत्वपूर्ण हिस्से की अनदेखी कर रही है जिसने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए उच्च-चयन पैनल का आदेश दिया था।
विधेयक में प्रस्ताव है कि चयन के लिए चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता (लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता) शामिल होंगे। इससे पहले, भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के बजाय चयन समिति का हिस्सा थे। कई विपक्षी सदस्यों का दावा है कि अन्य चिंताओं के अलावा, यदि विधेयक पारित हो जाता है, तो चयन प्रक्रिया पर सरकार का प्रभुत्व हो सकता है, जिससे चुनाव प्रक्रिया की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
क्या बोले कानून एवं विधि मंत्री?
इससे पहले कानून एवं विधि मंत्री अर्जुनराम मेघवाल ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं पदावधि) विधेयक 2023 को चर्चा एवं पारित करने के लिए पेश किया। उन्होंने कहा कि अगस्त 2023 में यह विधेयक राज्यसभा में पेश किया गया था और मूल विधेयक में मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य आयुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान नहीं था। उच्चतम न्यायालय ने सरकार को इस संबंध में एक कानून बनाने का निर्देश दिया था जिसके आधार पर यह विधेयक लाया गया है। उन्होंने कहा कि यह सरकारी संशोधन विधेयक है। उन्होंने कहा कि इसमें ‘सर्च कमेटी’ एवं चयन समिति का प्रावधान है। इसमें वेतन को लेकर भी एक प्रावधान है। मेघवाल ने कहा कि इसमें एक प्रावधान है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त यदि कोई कार्रवाई करते हैं तो उन्हें अदालती कार्रवाई से छूट दी गयी है।
जमकर बरसी कांग्रेस पार्टी
राज्यसभा में मंगलवार को विपक्षी दलों ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों की नियुक्ति के लिए लाये गये विधेयक के कई प्रावधानों का तीखा विरोध करते हुए आशंका जतायी कि इससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हो सकती है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने दावा किया कि इसके पीछे सरकार की मंशा निर्वाचन आयोग को ‘जेबी चुनाव आयोग’ बनाकर इसे अपनी मनमर्जी से चलाने की है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें एवं पदावधि) विधेयक 2023 पर उच्च सदन में चर्चा शुरू करते लेते हुए कांग्रेस सदस्य रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि ‘‘निष्पक्षता, निर्भीकता, स्वयात्तता और शुचिता’’ चुनाव के आधारस्तंभ होते हैं। उन्होंने दावा कि यह प्रस्तावित कानून इन चारों को ‘बुलडोजर’ से कुचल देने वाला है।
उन्होंने कहा कि सरकार इस विधेयक के जरिये चुनाव प्रक्रिया में हस्तक्षेप का प्रयास कर रही है। उन्होंने संविधान निर्माता डॉ बी आर आंबेडकर के एक वक्तव्य का हवाला देते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया कार्यपालिका के हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त रहनी चाहिए। सुरजेवाला ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्तों की नियुक्ति जो समिति करेगी, उसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता एवं प्रधानमंत्री द्वारा तय किया गया कोई केंद्रीय मंत्री होगा। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय कह चुका है कि यदि निर्वाचन आयुक्त निष्पक्ष चुनाव नहीं करा पता तो वह कानून के शासन के आधार को ही खत्म कर देगा। कांग्रेस सदस्य ने कहा कि यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 14 के विरूद्ध है और सरकार निष्पक्ष और स्वतंत्र मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य आयुक्त नहीं चाहती तथा वह एक ‘जेबी चुनाव आयुक्त’ चाहती है जिसे वह अपनी मर्जी से चला सके।