सुप्रीम कोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति को बड़ी राहत देते हुए उसकी सजा और दोषसिद्धि को रद्द कर दिया है। शीर्ष अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत प्राप्त विशेष शक्तियों का उपयोग करते हुए यह फैसला सुनाया। मामले की खास बात यह रही कि पीड़िता ने बालिग होने के बाद उसी व्यक्ति से विवाह कर लिया था और बाद में स्वयं उसके पक्ष में अदालत पहुंची।
पीड़िता ने ही पति की सजा खत्म करने की मांग की
मामले में महिला ने अपने पति को पॉक्सो कानून के तहत दी गई सजा को चुनौती देते हुए पहले मद्रास हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि वहां से राहत नहीं मिलने पर दंपति ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। महिला का कहना था कि अब दोनों वैवाहिक जीवन बिता रहे हैं, ऐसे में सजा को समाप्त किया जाना चाहिए।
अनुच्छेद 142 के तहत मिला राहत का रास्ता
संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी लंबित मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश जारी कर सके। इसी संवैधानिक शक्ति का उपयोग करते हुए अदालत ने मामले में हस्तक्षेप किया।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने आरोपी को बरी करते हुए कहा, ‘मामले के गुण-दोष पर जाए बिना और मामले की खास परिस्थितियों को देखते हुए, हम अपीलकर्ता की दोषसिद्धि और सजा के फैसले को रद्द करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी व्यापक शक्तियों का इस्तेमाल करना उचित समझते हैं… यह फैसला पॉक्सो अधिनियम की धारा 5(1) के तहत लगे आरोप के संबंध में है और अपीलकर्ता को इस आरोप से बरी किया जाता है.’
कोर्ट ने कहा- इसे मिसाल न माना जाए
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि यह निर्णय मामले की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखकर दिया गया है। अदालत ने कहा कि इस फैसले को भविष्य के अन्य मामलों में कानूनी मिसाल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
प्रेम संबंध से शुरू हुआ था पूरा मामला
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, यह मामला उस समय का है जब महिला 12वीं कक्षा में पढ़ाई कर रही थी। उसी दौरान उसका आरोपी व्यक्ति के साथ प्रेम संबंध बन गया था। बाद में जब युवक ने शादी करने से इनकार किया तो महिला ने उसके खिलाफ शिकायत दर्ज करवा दी।
एफआईआर दर्ज होने के बाद आरोपी को पॉक्सो अधिनियम के तहत नाबालिग के साथ शारीरिक संबंध बनाने का दोषी ठहराया गया और उसे 10 साल की सजा सुनाई गई।
बाद में दोनों ने कर ली शादी
मामले के दौरान महिला की शादी किसी अन्य व्यक्ति से हुई थी, लेकिन पुराने रिश्ते की जानकारी मिलने के कुछ समय बाद उसके पति ने उसे छोड़ दिया। इसके बाद जमानत पर बाहर आए आरोपी और महिला के बीच समझौता हो गया तथा दोनों ने विवाह कर लिया।
शादी के बाद दोनों साथ रहने लगे और महिला ने अपने पति की सजा खत्म कराने के लिए मद्रास हाईकोर्ट में याचिका दायर की। हालांकि हाईकोर्ट ने उनकी मांग को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद दोनों सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां उन्हें राहत मिल गई।