
बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान (बीएसआईपी) के वैज्ञानिक मेघालय के पश्चिमी जैंतिया हिल्स के जंगलों में स्थित पवित्र उपवन (सेक्रेड ग्रोव) तक पहुंच गए। वैज्ञानिकों के दल ने जैंतिया हिल्स के दुर्लभ जंगल का दौरा कर जियोबायोलॉजिकल पार्क की संभावनाओं का पता लगाया।
यहां के रहन सहन प्रकृति के हिसाब से हैं। इस पवित्र उपवन तक पहुंचना दुरूह है। यहां के आदिवासी समूह किसी बाहरी के दाखिल होने की इजाजत नहीं देते। स्थानीय वन विभाग के सहयोग से टीम नंगे पांव 1000 मीटर ऊंची जैंतिया हिल्स तक पहुंची।
बीएसआईपी के निदेशक प्रो. महेश जी. ठक्कर ने बताया कि हमारी टीम ने पश्चिमी जैंतिया हिल्स में सैन रायज ट्यूबर के पवित्र उपवन दौरा किया। यह अपने स्थायी जैव विविधता संरक्षण और जलवायु परिवर्तन शमन की क्षमता के लिए प्रसिद्ध है। टीम का मानना है कि भारत का यह अछूता हिस्सा काफी संभावनाएं रखता है और संभावित रूप से इसे यूनेस्को भू-विरासत स्थल के रूप में मान्यता दी जा सकती है। रहन सहन, प्राकृतिक संपदा यह दर्शाती है कि स्थायी जीवन के लिए स्वदेशी प्रथाएं प्रकृति के साथ कैसे तालमेल बिठा सकती हैं। ऊंची पहाड़ी पर रहने वाले आदिवासी समूहों के रहन सहन, रीत रीवाज तथा रेन फारेस्ट सिस्टम अलग है।
पवित्र उपवन में जूते, बेल्ट तथा चमड़े के उत्पाद प्रतिबंधित
सेंटर फार प्रमोशन आफ जियोहेरिटेज एंड जियो टूरिज्म (सीपीजीजी) की संयोजक डॉ. शिल्पा पांडेय के नेतृत्व में टीम ने पिछले दिनों यहां का दौरा किया। डॉ. शिल्पा के मुताबिक पूरे इलाके में कहीं भी कंक्रीट के निर्माण नहीं देखे गए। यहां जूते, बेल्ट और चमड़े की वस्तुओं को लेकर या पहनकर जाने की इजाजत नहीं है। यहां न कुछ ले जा सकते हैं और न ही लेकर आ सकते हैं। हमारी टीम घने जंगल में नंगे पांव चलने को लेकर चिंतित थी। हालांकि, यहां की जनजातियों ने रास्तों को इतनी अच्छी तरह बनाए रखा है कि टीम को एक कांटा भी नहीं लगा। भू-विरासत स्थलों की तलाश में निकली हमारी टीम ने पवित्र स्थल में प्रवेश करने से पहले स्थानीय नियमों और प्रतिबंधों का पालन किया।
जलाशय, सभास्थल के अवशेष प्रकृति के करीब
डॉ. शिल्पा के मुताबिक जैंतिया जनजातियों की आध्यात्मिक मान्यताओं और पारंपरिक अनुष्ठानों के माध्यम से संरक्षित कई स्थानिक, लुप्तप्राय और दुर्लभ पौधों देखे गए। डॉ. शिल्पा का मानना है कि जैंतिया हिल्स के आदिवासी समूह इको हेरिटेज के बड़े उदाहरण पेश कर रहे है। यहां के जलाशय, सभास्थल, स्थानिक व्यवस्था के अवशेष आदिवासी समूहों के प्रकृति प्रेम को दर्शाते हैं। जंगल में मिले सभागार के अवशेष बताते हैं कि कभी राजा वाली व्यवस्था रही होगी। इसे इको सिस्टम के मुताबिक स्थायी विकास का एक सच्चा उदाहरण माना जा सकता है।
कोई बाहरी वस्तु ले जाने की इजाजत नहीं
सेक्रेड ग्रोव का रखरखाव यहां के जनजातीय समुदाय बगैर किसी सरकारी हस्तक्षेप के बेहद सावधनी पूर्वक करता है। जंगल की पवित्रता को बनाए रखने के लिए आने वाले किसी व्यक्ति या समूह को कुछ ले जाने के इजाजत नहीं है। जंगल में प्राचीन सम्मेलन हॉल, कुएं और अन्य सुविधाएं विकसित हैं। यह प्लास्टिक, कंक्रीट या गैर-बायोडिग्रेडेबल सामग्री से मुक्त हैं। मेघालय की जैंतिया, गारो तथा खासी हिल्स प्राकृतिक संरक्षण का अदभुद नमूना है। यहां पहुंचने में मेघालय के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ हरीश सी चौधरी का विशेष सहयोग रहा।