
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस चेलमेश्वर ने एक जुलाई से लागू हुए तीनों नए आपराधिक कानूनों पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने इन कानूनों को नई बोतल में पुरानी शराब की तरह बताया है।साथ ही चिंता जताई है कि इससे पुलिस ज्यादती की आशंका भी बढ़ जाएगी। उन्होंने इन्हें सिर्फ दिखावे से अधिक कुछ नहीं बताया। पूर्व जज जस्टिस चेलमेश्वर जून 2018 में सुप्रीम कोर्ट के दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश के रूप में रिटायर हुए थे। एक जुलाई से देशभर में भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) लागू हो गई है। सरकार ने इसे 11 अगस्त 2023 को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), साक्ष्य अधिनियम 1872 और दंड प्रक्रिया संहिता 1973 से बदलने के लिए लोकसभा में पेश किया था।
सरकार का कहना है कि इन नए कानूनों के लागू करने का उद्देश्य प्रक्रियाओं को सरल बनाना, कानूनों को आज की स्थिति के लिए प्रासंगिक बनाना, त्वरित न्याय प्रदान करना और कानून को औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकालना है। इन कानूनों पर बात करते हुए पूर्व जज चेलमेश्वर ने कहा कि मुद्दा यह है कि क्या नए कानून वही करेंगे जो वे घोषित कर रहे हैं? मुझे इस पर बहुत संदेह है। भले ही मैं अभी भी कानून को बारीकी से पढ़ने की प्रक्रिया में हूं, लेकिन मैं जो देख सकता हूं, उसके अनुसार कुछ बदलाव अनावश्यक हैं।”
उन्होंने कहा, “भारतीय साक्ष्य अधिनियम, जिसे अब बीएसए के नाम से जाना जाता है, में किए गए बदलावों के तहत अदालतों को मामले की सुनवाई में अनावश्यक देरी से बचने के लिए अधिकतम दो स्थगन की अनुमति है। आपराधिक मामले का फैसला सुनवाई समाप्त होने के 45 दिनों के भीतर सुनाया जाना चाहिए। पहली सुनवाई के 60 दिनों के भीतर आरोप तय किए जाने चाहिए। आखिर अदालतें इतनी सख्त समयसीमा कैसे तय कर सकती हैं? क्या हमारे पास इसके लिए साधन हैं।”