हम चुनाव नहीं होने देंगे, राम नवमी हिंसा पर भड़का कोलकाता हाईकोर्ट; EC से करेगा सिफारिश?

लकत्ता उच्च न्यायालय ने मंगलवार को चेतावनी देते हुए कहा कि वह पश्चिम बंगाल के उन लोकसभा क्षेत्रों में मतदान की अनुमति नहीं देगा जहां रामनवमी समारोह के दौरान सांप्रदायिक हिंसा हुई थी।

मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवगणम की अध्यक्षता वाली पीठ ने ये बात कही। कोर्ट की यह टिप्पणी 17 अप्रैल को रामनवमी जुलूस के दौरान मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा पर सुनवाई के दौरान आई।

पीठ ने कहा, “अगर लोग शांति और सद्भाव से नहीं रह सकते, तो हम कहेंगे कि चुनाव आयोग इन जिलों में संसदीय चुनाव नहीं कराए। यही एकमात्र तरीका है।” पीठ ने आगे कहा, “आदर्श आचार संहिता लागू होने के बावजूद, अगर दो समूह के लोग इस तरह लड़ रहे हैं, तो वे किसी भी निर्वाचित प्रतिनिधि के लायक नहीं हैं।”

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने कहा कि रामनवमी पर कोलकाता में भी इसी तरह के जुलूस निकले थे, लेकिन वहां हिंसा की कोई खबर नहीं आई। उन्होंने कहा, “कोलकाता में भी 23 जगहों पर जश्न मनाया गया लेकिन कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। अगर एमसीसी (आदर्श आचार संहिता) लागू होने पर ऐसा होता है, तो राज्य पुलिस क्या करती है? केंद्रीय बल क्या कर रहे हैं? दोनों झड़पों को रोक नहीं सके।” पीठ ने राज्य के वकील से पूछा कि हिंसा से संबंधित मामलों में कितने लोगों को गिरफ्तार किया गया है।

इस पर राज्य के वकील ने अदालत को सूचित किया कि सीआईडी ने अब जांच अपने हाथ में ले ली है। पीठ ने जवाब दिया, “हमारा प्रस्ताव है कि हम भारत के चुनाव आयोग को एक सिफारिश करेंगे कि जो लोग शांति से जश्न नहीं मना सकते, उन्हें चुनाव में भाग लेने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।”

हालांकि उच्च न्यायालय ने किसी भी सीट पर चुनाव स्थगित करने पर कोई आदेश जारी नहीं किया, लेकिन उसने कहा कि वह चुनाव आयोग को प्रस्ताव देगा कि बरहामपुर में चुनाव स्थगित कर दिया जाना चाहिए, जो मुर्शिदाबाद के अंतर्गत आता है। उच्च न्यायालय ने राज्य पुलिस को सांप्रदायिक झड़पों पर एक रिपोर्ट दाखिल करने का भी निर्देश दिया। अगली सुनवाई शुक्रवार 26 अप्रैल को होगी।

इससे पहले निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में रामनवमी के जुलूस के दौरान हुई हिंसा को रोकने में कथित तौर असफल रहने पर दो पुलिस थानों के प्रभारियों को निलंबित कर दिया। निर्वाचन आयोग के अनुसार, शक्तिपुर और बेलडांगा पुलिस थानों के प्रभारी निर्देशों के बावजूद ‘‘धार्मिक हिंसा’’ को रोकने में विफल रहे।

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