
लूना-25 के क्रैश होने से रूस के मिशन मून को झटका लगा है। इसको लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। ऐसी ही एक आशंका इस बात को लेकर है कि कहीं शॉर्टकट तो लूना के लिए मुसीबत नहीं बन गया?
बता दें कि चंद्रयान-3 से काफी वक्त के बाद लांच होने के बावजूद लूना चंद्रमा पर पहुंचने की रेस में काफी आगे था। रूसी स्पेस एजेंसी ने भी इसको लेकर अपनी गलती मानी है। इन सबके बीच चंद्रयान-3 को इसरो लगातार अपडेट दे रहा है। अभी तक की रिपोर्ट के मुताबिक चंद्रयान-3 की यात्रा योजनाओं के मुताबिक चल रही है और इसका चंद्रयान-2 से दोतरफा संवाद भी कायम हो गया है। चंद्रयान को लेकर इसरो किस तरह के एहतियात बरत रहा है, यह जानना भी अहम है।
क्यों क्रैश हुआ लूना-25
आइए सबसे पहले जानते हैं आखिर लूना-25 क्यों क्रैश हुआ? इसको लेकर रूसी स्पेस एजेंसी ने खुद जानकारी दी है। इस जानकारी के मुताबिक लूना-25 तय पैरामीटर्स से अलग चला गया था। वह उस ऑर्बिट में चला गया, जहां उसको जाना ही नहीं थी। नतीजा, लूना-25 चांद के दक्षिणी ध्रुव के पास जाकर क्रैश हो गया। रूस ने 21 से 22 अगस्त के बीच की तारीख लूना की की लैंडिंग के लिए तय की थी। सोयुज रॉकेट से लांचिंग के बाद यह पांच दिन के अंदर ही चांद के चारो ऑर्बिट में पहुंचा, लेकिन लैंडिंग नहीं कर पाया और क्रैश कर गया। इस तरह करीब 47 साल बात रूस का मिशन मून का सपना टूट गया।
इसरो इस तरीके से काम कर रहा
इसरो ने चांद तक जाने के लिए रूस की तुलना में ज्यादा समय लेने वाला रूट चुना। इसके पीछे कुछ खास वजहें हैं। पहली वजह तो चारों तरफ घुमाकर अंतरिक्षयान को भेजने की यह प्रक्रिया तुलनात्मक रूप से सस्ती पड़ती है। इसमें धरती की ग्रैविटी और पृथ्वी की गति का सहारा लिया जाता है। वहीं, लूना के लिए रूस ने हजारों करोड़ के रॉकेट का इस्तेमाल किया था। वहीं, इसरो का तरीका सस्ता होने के साथ-साथ सुरक्षित भी माना जाता है। इसरो ने रविवार को कहा कि रोवर के साथ लैंडर मॉड्यूल के 23 अगस्त को शाम तकरीबन छह बजकर चार मिनट पर चंद्रमा की सतह पर उतरने की संभावना है। चंद्रयान-3 का प्रक्षेपण 14 जुलाई को किया गया था और इसका मकसद चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ‘सॉफ्ट लैंडिंग’ की उपलब्धि हासिल करना है।
इसरो ने लांच की नई तस्वीरें
इसरो ने ‘लैंडर हजार्ड डिटेक्टशन एंड अवॉइडेंस कैमरा’ (एलएचडीएसी) में कैद की गई चंद्रमा के सुदूर पार्श्व भाग की तस्वीरें सोमवार को जारी कीं। एलएचडीएसी को इसरो के अहमदाबाद स्थित प्रमुख अनुसंधान एवं विकास केंद्र ‘स्पेस ऐप्लीकेशंस सेंटर’ (एसएसी) ने विकसित किया है। यह कैमरा लैंडिंग के लिहाज से सुरक्षित उन क्षेत्र की पहचान करने में मदद करता है, जहां बड़े-बड़े पत्थर या गहरी खाइयां नहीं होती हैं। अंतरिक्ष एजेंसी के अनुसार, चंद्रयान-3 मिशन के कई लक्ष्यों को हासिल करने के लिए लैंडर में एलएचडीएसी जैसी कई अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियां मौजूद हैं।