केरल में सत्ता में वापसी के बाद कांग्रेस के सामने मुख्यमंत्री के चयन को लेकर नई चुनौती खड़ी हो गई है। यह मुकाबला केवल नेताओं के बीच नहीं, बल्कि जातीय संतुलन के इर्द-गिर्द घूम रहा है। दिलचस्प बात यह है कि पार्टी के तीनों प्रमुख दावेदार—रमेश चेन्निथल्ला, वीडी सतीशन और केसी वेणुगोपाल—सभी नायर समुदाय से आते हैं, जिसे राज्य की अगड़ी जाति माना जाता है।
केरल की राजनीति में जातीय गणित की अहम भूमिका
राज्य की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरण हमेशा निर्णायक रहे हैं। केरल की करीब 55% आबादी हिंदू है, जिसमें लगभग 60% ओबीसी, 30% सामान्य वर्ग, 9% एससी और 1% एसटी शामिल हैं। इसके अलावा 27% मुस्लिम और 18% ईसाई समुदाय की हिस्सेदारी भी चुनावी नतीजों को प्रभावित करती है। ऐसे में किसी एक वर्ग को ज्यादा तवज्जो देना सियासी संतुलन बिगाड़ सकता है।
पिछड़े वर्ग से रहा हाल का नेतृत्व
पिछले एक दशक तक केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन रहे, जो एझवा समुदाय से आते हैं और यह राज्य का एक बड़ा ओबीसी वर्ग है। ऐसे में अब कांग्रेस के सामने यह सवाल भी है कि क्या वह फिर से किसी अगड़ी जाति के चेहरे पर दांव लगाएगी या सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए अलग रणनीति अपनाएगी।
अब तक के मुख्यमंत्रियों का जातीय रुझान
केरल में अब तक 12 मुख्यमंत्री रह चुके हैं, जिनमें 9 हिंदू समुदाय से थे। इनमें से 6 अगड़ी जाति के थे और उनमें भी 5 नायर समुदाय से आते थे, जबकि एक ब्राह्मण वर्ग से था। वहीं 3 मुख्यमंत्री ओबीसी समुदाय से रहे हैं, जो कांग्रेस और वाम दलों दोनों से जुड़े थे।
अल्पसंख्यक समुदाय की भूमिका भी अहम
राज्य की राजनीति में अल्पसंख्यक समुदायों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। केरल में दो मुख्यमंत्री ईसाई समुदाय से भी बने—एके एंटनी और ओमान चांडी—जिन्हें कांग्रेस ने ही मौका दिया था। यही कारण है कि ईसाई समुदाय का झुकाव अक्सर कांग्रेस की ओर देखा जाता है। इसके अलावा एक मुस्लिम मुख्यमंत्री भी राज्य में रह चुके हैं, जो IUML से जुड़े थे।
कांग्रेस के सामने संतुलन बनाने की चुनौती
ऐसे में कांग्रेस के लिए मुख्यमंत्री का चयन केवल नेतृत्व का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संतुलन साधने की बड़ी परीक्षा बन गया है। पार्टी को ऐसा चेहरा चुनना होगा जो सभी वर्गों को साध सके और राज्य में स्थिर सरकार देने में सक्षम हो।