
भारत बुधवार को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास अंतरिक्ष यान (चंद्रयान -3) उतारने वाला पहला देश बन गया। ऐतिहासिक यात्रा पूरी कर जहां भारत पहुंचा है वह चांद का एक अज्ञात क्षेत्र है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि इस इलाके में जमे हुए पानी के महत्वपूर्ण भंडार हो सकते हैं। 2019 में चंद्रमा पर उतरने के असफल प्रयास के बाद, भारत अब अमेरिका, सोवियत संघ और चीन के साथ इस मील के पत्थर को हासिल करने वाला चौथा देश बन गया है। रोवर प्रज्ञान के साथ लैंडर विक्रम बुधवार शाम 6:04 बजे चंद्रमा की सतह पर उतरा।
रोवर ‘प्रज्ञान’ लैंडर ‘विक्रम’ से बाहर निकला
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) से जुड़े सूत्रों ने बृहस्पतिवार को बताया कि रोवर ‘प्रज्ञान’ लैंडर ‘विक्रम’ से बाहर निकल आया है और यह अब यह चंद्रमा की सतह पर घूमेगा। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ‘विक्रम’ लैंडर से रोवर ‘प्रज्ञान’ के सफलता पूर्वक बाहर आने पर इसरो की टीम को बधाई दी। अपने आधिकारिक ‘एक्स’ हैंडल पर इसरो ने कहा कि ”रोवर बाहर निकल आया है”। इसरो ने कहा, ”चंद्रयान-3 रोवर : ‘मेड इन इंडिया – मेड फॉर मून’। चंद्रयान-3 का रोवर लैंडर से बाहर निकल आया है और भारत ने चांद की सैर की।” चंद्रयान-3 के दो सप्ताह (14 दिन) तक एक्टिव रहने की उम्मीद है। लेकिन 14 पृथ्वी दिवस के बाद चंद्र मिशन और उसके कॉम्पोनेंट्स का क्या होगा?
चंद्रयान-3 के लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान सौर ऊर्जा से संचालित हैं। उनका जीवन एक चंद्र दिवस या लगभग 14 पृथ्वी दिवस का है। दरअसल इतने दिनों तक चांद पर सूरज की रोशनी बनी रहेगी जिससे रोवर और लैंडर अपना काम जारी रख सकते हैं। चंद्रमा पर सूरज की रोशनी का नया साइकल 23 अगस्त को शुरू हुआ था, यही कारण है कि इसरो ने सॉफ्ट लैंडिंग के लिए इस दिन को टारगेट किया। अगले 14 दिनों तक वहां सूरज की रोशनी बनी रहेगी। लेकिन 14 दिनों के बाद अगले 14 दिनों के लिए चंद्रमा पर सूर्य अस्त हो जाएगा। इस दौरान चंद्रमा की सतह पर तापमान शून्य से 180 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है, जिससे कोई भी उपकरण वहां काम नहीं कर पाएगा।
बाद में भी जारी रख सकता है काम
चंद्रयान-3 मिशन का जीवन एक चंद्र दिवस (14 दिन) का है, लेकिन इसरो अधिकारियों ने लैंडर विक्रम और रोवर प्रज्ञान के एक और चंद्र दिवस तक काम करते रहने की संभावना से इनकार नहीं किया है। इसरो के अध्यक्ष एस सोमनाथ के अनुसार, जब तक सूर्य चमकता रहेगा, सभी सिस्टम में इसकी पावर बनी रहेगी। उन्होंने कहा, “जिस क्षण सूरज डूबेगा, सब कुछ घोर अंधकार में होगा। तापमान शून्य से 180 डिग्री सेल्सियस तक नीचे चला जाएगा। इसलिए सिस्टम का जीवित रहना संभव नहीं है। ऐसे में अगर यह आगे भी जीवित रहता है, तो हमें खुश होना चाहिए कि यह एक बार फिर से जीवित हो गया है और हम सिस्टम पर एक बार फिर से काम कर पाएंगे, और हम आशा करते हैं कि ऐसा ही होगा।” सीधे शब्दों में कहें तो 14 दिनों तक काम करने के बाद, रोवर प्रज्ञान और लैंडर विक्रम अगले 14 दिनों तक थम जाएंगे। 14 दिन बाद जब चांद पर दोबारा सूरज की रोशनी आएगी तो ऐसी उम्मीद लगाई जा रही है कि ये दोनों फिर से एक्टिवेट हो सकते हैं।
किसी भी स्थिति में, चंद्रयान-3 का कोई भी पार्ट पृथ्वी पर वापस नहीं आएगा। वे चंद्रमा पर ही रहेंगे। 600 करोड़ रुपये की लागत वाला चंद्रयान-3 मिशन 14 जुलाई को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास पहुंचने के लिए 41 दिन की यात्रा के लिए लॉन्च व्हीकल मार्क-III (एलवीएम-3) रॉकेट पर लॉन्च किया गया था। रूस के लूना-25 अंतरिक्ष यान के नियंत्रण से बाहर होकर चंद्रमा पर दुर्घटनाग्रस्त होने के कुछ दिनों बाद सफल सॉफ्ट-लैंडिंग हासिल की गई।
कितने वजन का है रोवर?
बता दें कि चंद्रयान-3 के एलएम ‘विक्रम’ ने तय समय पर बुधवार को शाम छह बजकर चार मिनट पर चांद की सतह को छुआ, जिससे पूरा देश जश्न में डूब गया। इसरो ने इससे पहले कहा था कि 26 किलोग्राम वजनी छह पहियों वाले रोवर को लैंडर के अंदर से चांद की सतह पर उसके एक ओर के पैनल को रैंप की तरह इस्तेमाल करते हुए बाहर निकाला जाएगा। लैंडर (विक्रम) और रोवर (प्रज्ञान) का कुल वजन 1,752 किलोग्राम है और जिन्हें चंद्रमा के वातावरण के अध्ययन के उद्देश्य से एक चंद्र दिवस अवधि (करीब 14 पृथ्वी दिवस) तक संचालन के लिए डिजाइन किया गया है।
चांद पर क्या करेगा प्रज्ञान?
इसरो के अधिकारियों ने हालांकि इसके अगले चंद्र दिवस तक काम करते रहने की संभावना से इनकार नहीं किया है। रोवर इस दौरान चांद की सतह पर घूमकर वहां मौजूद रसायन का विश्लेषण करेगा। लैंडर और रोवर के पास वैज्ञानिक पेलोड हें जो चांद की सतह पर प्रयोग करेंगे। रोवर अपने पेलोड ‘एपीएक्सएस’ (अल्फा पार्टिकल एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर) के जरिए चंद्रमा की सतर का अध्ययन करेगा ताकि रासायनिक संरचना की जानकारी प्राप्त की जा सके और चंद्रमा की सतह के बारे में ज्ञान को और बढ़ाने के लिए खनिज संरचना का अनुमान लगाया जा सके। ‘प्रज्ञान’ में भी एक पेलोड – ‘लेजर इंड्यूस्ड ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोप’ (एलआईबीएस) है जो चंद्रमा की मिट्टी और चट्टानों की मौलिक संरचना का पता लगाएगा।