
अनुभवी नेताओं में शुमार मराठा दिग्गज शरद पवार की टिप्पणी ने कांग्रेस को पुनरुत्थान का मंत्र दे दिया है। 1999 में दूसरी बार कांग्रेस छोडऩे के बाद अपनी अलग राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी चला रहे शरद पवार ने हाल में कहा कि आने वाले समय में क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस से निकटता बढ़ेगी और उनमें से कुछ उसमें विलय भी कर सकते हैं। लोकसभा चुनाव के बीच ऐसी टिप्पणी के नफा-नुकसान, दोनों संभव हैं। इसके बावजूद पवार जैसे राजनीति के चतुर खिलाड़ी ने यह टिप्पणी की है तो उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बेशक पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और झारखंड जैसे राज्यों में अभी भी क्षेत्रीय दलों या उनके नेतृत्व वाले गठबंधन की सरकारें हैं, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दल अभी भी बड़ी ताकत हैं, खुद पवार के गृह राज्य महाराष्ट्र में उनकी राकांपा के अलावा उद्धव ठाकरे की शिवसेना बड़ी ताकत है, फिर भी पवार आने वाले समय में क्षेत्रीय दलों की कांग्रेस से निकटता या उसमें विलय की संभावनाएं देख रहे हैं तो उसका एक कारण पिछले दिनों क्षेत्रीय दलों में लगातार टूट की घटनाएं भी हैं। क्षेत्रीय दल चला पाना आसान कभी नहीं रहा लेकिन इधर उन्हें बचाए रखना भी मुश्किल हो गया है। आखिर शरद पवार जैसे सत्ता के माहिर खिलाड़ी की राकांपा को उनके भतीजे अजित पवार ने ही दो बार तोड़ दिया। पहली बार सुबह का भूला बन कर अजित शाम को घर लौट आए, पर दूसरी बार पूरी तैयारी से गए। बाला साहेब ठाकरे के कट्टर मराठा और हिंदूवादी विचारों से बनी और संचालित शिवसेना में इतने बड़े विभाजन की कल्पना भी मुश्किल थी, पर जो हुआ, सबने देखा। ऐसे में भविष्य को लेकर क्षेत्रीय दलों में ङ्क्षचता स्वाभाविक है,राष्ट्रीय राजनीति में नए सिरे से ध्रुवीकरण की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।जिस तरह सोनिया गांधी को अध्यक्ष पद के चुनाव में चुनौती देने वाले जितेंद्र प्रसाद के बेटे जितिन को भी भाजपा में जाने से पहले कांग्रेस ने सब कुछ दिया, वह इस बात का प्रमाण है कि पार्टी अपने परिवारों का ख्याल तो रखती है। एक दशक से भी ज्यादा समय से बंगाल में तृणमूल ही सबसे बड़ा दल है, जबकि कांग्रेस और वाम मोर्चा अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में अगर कांग्रेस जमीनी हकीकत स्वीकार करते हुए ममता की ससम्मान घर वापसी की कोशिश करे तो ज्यादा समस्या नहीं होनी चाहिए। आंध्र प्रदेश में सत्तारूढ़ वाई.एस.आर.सी.पी. के मुखिया जगन मोहन रैड्डी ने भी सत्ता की महत्वाकांक्षाओं के टकराव के चलते ही कांग्रेस छोड़ी थी। इस बार नायडू की तेलुगू देशम पार्टी ने भाजपा से चुनावी गठबंधन किया है, जबकि कांग्रेस ने जगन की नाराज बहन शर्मिला को ही अपना प्रदेश अध्यक्ष बना दिया है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना की तरह अलग विचारधारा वाली समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल से भी कांग्रेस का गठबंधन तो है ही। ये सभी दल पहली श्रेणी में आते हैं, जिनकी भविष्य में कांग्रेस से निकटता बढ़ सकती है। जाहिर है, सब कुछ भविष्य के गर्भ में है और 4 जून के चुनाव परिणामों पर निर्भर करेगा लेकिन शरद पवार की टिप्पणी को संकेत मान कर पुराने नेताओं के दलों के एकीकरण से कांग्रेस अपने पुनरुत्थान की पहल निश्चय ही कर सकती है।