Bengal Mid-Day Meal Row: ‘बच्चों को हफ्ते में नहीं, हर दिन मिले अंडा’, सरकार के फैसले पर TMC का बड़ा हमला

पश्चिम बंगाल के सरकारी स्कूलों में मिड-डे-मील के तहत बच्चों को अंडा दिए जाने को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। राज्य सरकार की ओर से सप्ताह में दो दिन मिड-डे-मील के साथ अंडा देने की घोषणा के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) के विधायक कुणाल घोष ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि बच्चों को केवल दो दिन नहीं, बल्कि स्कूल खुलने वाले हर दिन अंडा दिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि बच्चों के बेहतर पोषण को ध्यान में रखते हुए अंडे को मिड-डे-मील का नियमित हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

‘हफ्ते में दो दिन नहीं, रोज मिलना चाहिए अंडा’

समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में कुणाल घोष ने कहा, “स्कूलों में बच्चों को मिड-डे-मील में हफ्ते में सिर्फ दो ही दिन क्यों, हर रोज उन्हें खाने में अंडा देना चाहिए. जब भी स्कूल खुले हों, बच्चों को अंडा दिया जाना चाहिए. ये तो हमारी मांग के बाद दो अंडे देने की बात कही गई है, नहीं तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) वालों ने तो मेन्यू से अंडा पूरी तरह से निकाल ही दिया था.”

उन्होंने कहा कि पोषण के लिहाज से अंडा बच्चों के लिए बेहद लाभदायक है और यह उनके भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।

ISKCON का सम्मान, लेकिन पोषण से समझौता नहीं: कुणाल घोष

कुणाल घोष ने कहा, “इस्कॉन एक सम्मानिक संगठन है. मैं भी इस्कॉन में जाता हूं. प्रसाद खाता हूं, लेकिन वो एक धार्मिक प्रतिष्ठान है और उनका जो भी मेन्यू होगा, वो पूरी तरह से शुद्ध शाकाहारी होगा, लेकिन पोषण के लिहाज से अंडा बेहद फायदेमंद है और बच्चों के लिए भी यह एक बड़ा आकर्षण है. जो लोग शाकाहारी लाइफस्टाइल अपनाते हैं, उनके लिए शाकाहारी खाना सही है, लेकिन जो लोग अंडा खाते हैं, उन्हें इससे वंचित क्यों रखा जाए? अंडे को सिर्फ हफ्ते में दो दिन नहीं, बल्कि मिड-डे-मील का रेगुलर हिस्सा बनाया जाना चाहिए.”

बागी सांसदों की वापसी पर भी उठाए सवाल

तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों की संभावित वापसी को लेकर भी कुणाल घोष ने टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “जब वे लोकसभा में बोलते हैं, तो ब्रॉडकास्टिंग में उनकी पहचान टीएमसी के रूप में दिखाती जाती है, लेकिन लगता है कि उन्हें खुद अपनी राजनीतिक स्थिति का ही पता नहीं है. वे टीएमसी के टिकट पर चुनाव जीतकर आए, बीजेपी के साथ बैठकें करते रहे, फिर दावा करते हैं कि वे NCPI में शामिल हो गए हैं, जबकि संसद उन्हें अब भी टीएमसी के रूप में पहचानती है. आखिर इन लोगों की असली राजनीतिक पहचान क्या है?”

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