लखनऊ। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि हिंदू विवाह की वैधता केवल पंजीकरण पर निर्भर नहीं करती। अगर विवाह पंजीकृत नहीं भी है तो वह अवैध या अमान्य नहीं माना जाएगा। अदालत ने कहा कि विवाह प्रमाणपत्र केवल साक्ष्य (Evidence) का साधन है, विवाह की वैधता का आधार नहीं।
मामला क्या है?
आजमगढ़ निवासी सुनील दुबे और उनकी पत्नी मीनाक्षी ने 23 अक्टूबर 2024 को हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(बी) के तहत आपसी सहमति से तलाक की अर्जी फैमिली कोर्ट में दायर की थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पति को विवाह पंजीकरण प्रमाणपत्र पेश करने का आदेश दिया।
जब पति ने कहा कि विवाह रजिस्टर्ड नहीं है और प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं, तो फैमिली कोर्ट ने उसका आवेदन खारिज कर दिया। इसके खिलाफ सुनील दुबे ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता की दलील
वकील ने अदालत को बताया कि –
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8 में विवाह पंजीकरण का प्रावधान है, लेकिन इसके अभाव में विवाह अमान्य नहीं होता।
- उनका विवाह 27 जून 2010 को हुआ था, जबकि उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियमावली, 2017 बाद में लागू हुई।
- नियमावली 2017 की धारा 6 के अनुसार भी, पंजीकरण न होने से विवाह अवैध नहीं ठहरता।
पत्नी मीनाक्षी ने भी इस दलील का समर्थन किया।
हाईकोर्ट का निर्णय
जस्टिस मनीष कुमार निगम की एकल पीठ ने कहा –
- विवाह पंजीकरण का उद्देश्य केवल विवाह को साबित करने का एक आसान साधन उपलब्ध कराना है।
- इसकी अनुपस्थिति में विवाह की वैधता प्रभावित नहीं होती।
- हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 8(5) स्पष्ट करती है कि पंजीकरण न होने पर भी विवाह अवैध नहीं होता।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का 31 जुलाई 2025 का आदेश रद्द कर दिया और कहा कि विवाह प्रमाणपत्र की मांग अनुचित थी। साथ ही, फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि तलाक याचिका पर जल्द सुनवाई कर दोनों पक्षों को साक्ष्य पेश करने का अवसर दे।
फैसले का महत्व
यह आदेश खासकर उन मामलों में महत्वपूर्ण है, जहां विवाह काफी पहले हुआ हो और रजिस्टर्ड न कराया गया हो। हाईकोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ प्रमाणपत्र के अभाव में पति-पत्नी के अधिकार प्रभावित नहीं किए जा सकते।