उन्नाव रेप केस में कुलदीप सेंगर को बड़ा झटका, सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले पर उठाए सवाल

उन्नाव रेप मामले में दोषी पूर्व विधायक कुलदीप सेंगर की सजा स्थगित करने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. शीर्ष अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर सवाल उठाते हुए मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस हाई कोर्ट भेज दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने ‘लोकसेवक’ की परिभाषा को जरूरत से ज्यादा तकनीकी तरीके से देखा.

दरअसल, दिल्ली हाई कोर्ट ने पिछले साल दिसंबर में कुलदीप सेंगर की सजा स्थगित करते हुए उन्हें जमानत दी थी. इस फैसले के खिलाफ सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसके बाद शीर्ष अदालत ने 29 दिसंबर को हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

शुक्रवार, 15 मई को हुई सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्य कांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने कहा कि हाई कोर्ट इस मामले पर नए सिरे से विचार करे. कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हाई कोर्ट सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित न हो.

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट को निर्देश दिया कि मुख्य मामले की सुनवाई दो महीने के भीतर पूरी की जाए. साथ ही सेंगर की ओर से पेश वरिष्ठ वकील एन हरिहरन के अनुरोध पर अदालत ने यह भी दर्ज किया कि हाई कोर्ट पहले सजा स्थगन के मुद्दे पर विचार कर सकता है.

‘लोकसेवक’ की परिभाषा पर उठा विवाद

2017 के उन्नाव रेप मामले में निचली अदालत ने कुलदीप सेंगर को आईपीसी की धारा 376(1) और पॉक्सो एक्ट की धारा 5(C) के तहत उम्रकैद की सजा सुनाई थी. ये धाराएं उस स्थिति में लागू होती हैं, जब किसी ‘लोकसेवक’ पर रेप का आरोप हो.

निचली अदालत ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून में दी गई ‘लोकसेवक’ की परिभाषा को आधार बनाया था. हालांकि दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि विधायक पॉक्सो एक्ट के तहत ‘लोकसेवक’ की श्रेणी में नहीं आता.

सीबीआई की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि एक विधायक प्रभावशाली पद पर होता है, इसलिए उसे इस श्रेणी से बाहर नहीं माना जा सकता.

पीड़िता की उम्र को लेकर भी हुई बहस

सुनवाई के दौरान सेंगर की ओर से वरिष्ठ वकील एन हरिहरन ने यह दलील भी दी कि पीड़िता नाबालिग नहीं थी. उन्होंने कहा कि AIIMS मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट भी इसी ओर इशारा करती है और अन्य रिपोर्ट भी सेंगर के पक्ष में हैं.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील पर विस्तार से टिप्पणी करने से इनकार करते हुए कहा कि इन सभी तथ्यों को हाई कोर्ट के सामने रखा जाए.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *