UP Politics: लखनऊ से कांग्रेस का बड़ा दांव, कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग, सपा-बसपा की राजनीति में नई हलचल

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में कांशीराम की जयंती से पहले आयोजित एक कार्यक्रम ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। शुक्रवार, 13 मार्च को हुए इस कार्यक्रम में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी शामिल हुए। कार्यक्रम के दौरान एक प्रस्ताव पारित कर बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग की गई, जिसे राजनीतिक रूप से अहम कदम माना जा रहा है।

कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने यह भी कहा कि जब राहुल गांधी प्रधानमंत्री बनेंगे तो यह मांग पूरी की जाएगी। इस प्रस्ताव को उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस की नई रणनीति के रूप में देखा जा रहा है, जो बहुजन वोट बैंक को साधने की कोशिश मानी जा रही है।

शिक्षा और संगठन पर राहुल गांधी का जोर

अपने संबोधन में राहुल गांधी ने सामाजिक न्याय और शिक्षा के मुद्दों पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा, ‘यह भाषण देने से पहले मैं सोच रहा था कि अंबेडकर जी शिक्षा के बारे में कैसे बात करते थे. वे संगठन के महत्व पर जोर देते थे. और जब कांशीराम जी उत्तर प्रदेश में रात के समय यात्रा करते थे, तो वे अपने साथ एक पेन लेकर चलते थे. वे कहा करते थे कि पेन ऐसा होना चाहिए कि समाज के 15 प्रतिशत लोगों को ही नहीं, बल्कि 85 प्रतिशत लोगों को भी उसका लाभ मिले और उन्हें भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जाए.’

राहुल गांधी ने अपने भाषण में सामाजिक भागीदारी और समान अवसरों की जरूरत पर जोर देते हुए कांशीराम की राजनीति को समावेशी विचारधारा से जोड़ा।

बीजेपी पर साधा निशाना, चुनाव को लेकर दिया संकेत

अपने भाषण के दौरान राहुल गांधी ने भारतीय जनता पार्टी पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा, ‘लेकिन अब क्या हो गया है? बीजेपी ने एक नया सिस्टम बना दिया है. बीजेपी ने पेन को उसके ढक्कन से अलग कर दिया है. ढक्कन को कहीं फेंक दिया है-किसी को पता नहीं कहां-और अब वे सिर्फ पेन लेकर घूम रहे हैं. मैंने यह बात एक बार किसी से कही भी थी-हालांकि मुझे नहीं पता कि उसे कहना सही था या नहीं-लेकिन मुझे सच में लगता है कि अगर जवाहरलाल नेहरू आज जिंदा होते, तो कांशीराम जी कांग्रेस के मुख्यमंत्री होते.’

इस बयान को आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के संदर्भ में कांग्रेस के राजनीतिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांशीराम के नाम पर कांग्रेस की सक्रियता सपा और बसपा दोनों के पारंपरिक समर्थन आधार को प्रभावित कर सकती है।

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