बिहार की राजनीति में शराबबंदी कानून एक बार फिर एनडीए (NDA) के गले की फांस बनता जा रहा है। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी (RLM) द्वारा सदन में सवाल उठाए जाने के बाद अब केंद्रीय मंत्री और एनडीए के प्रमुख सहयोगी जीतन राम मांझी ने भी अपनी ही सरकार की टेंशन बढ़ा दी है। बुधवार (18 फरवरी 2026) को गया स्थित अपने आवास पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए मांझी ने दो टूक कहा कि शराबबंदी कानून की मंशा तो सही है, लेकिन जमीन पर इसका क्रियान्वयन पूरी तरह फेल है और इसमें भारी गड़बड़ी हो रही है। मांझी का यह बयान आरएलएम विधायक माधव आनंद की उस मांग के बाद आया है, जिसमें उन्होंने कानून की समीक्षा की बात कही थी।
‘हजारों लीटर वाले छूट जाते हैं, गरीब फंस जाते हैं’
जीतन राम मांझी ने पुलिस और प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि वे लगातार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से इस कानून की समीक्षा की मांग करते रहे हैं। उनके आग्रह पर तीसरी बार समीक्षा हुई थी, जिसमें यह प्रावधान किया गया था कि मामूली मात्रा में (250 से 500 ग्राम) शराब के साथ पकड़े जाने पर गिरफ्तारी नहीं होगी। लेकिन हकीकत इसके उलट है। मांझी ने आरोप लगाया कि “हजारों-लाखों लीटर की तस्करी करने वाले माफिया पैसे खिलाकर छूट जाते हैं, जबकि पुलिस का डंडा सिर्फ गरीबों और 250 ग्राम पीने वालों पर चल रहा है।”
बिहार का पैसा बाहर जा रहा, होम डिलीवरी जारी
केंद्रीय मंत्री ने शराबबंदी से हो रहे आर्थिक नुकसान का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि जब राज्य में शराबबंदी प्रभावी ही नहीं है और धड़ल्ले से ‘होम डिलीवरी’ हो रही है, तो इसका सीधा मतलब है कि बिहार का पैसा दूसरे राज्यों में जा रहा है। अमीर लोग बाहर से मंगवाकर महंगी शराब पी रहे हैं, जबकि गरीब और दलित समाज के लोग दो घंटे में तैयार होने वाली जहरीली शराब पीकर अपनी जान गंवा रहे हैं। मांझी ने साफ शब्दों में कहा कि इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए क्योंकि यह नीति गरीबों की जान ले रही है और राज्य के राजस्व को नुकसान पहुंचा रही है।