उत्तर प्रदेश में आगामी त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों से पहले मतदाता सुविधा और पारदर्शिता बढ़ाने को लेकर एक अहम मुद्दा सामने आया है। मजिस्ट्रेट कोर्ट के पेशकार नरेश कुमार मौर्य ने अधिवक्ताओं के माध्यम से हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की है, जिसमें दो प्रमुख मांगें रखी गई हैं:
- NOTA (नोटा) विकल्प लागू किया जाए।
- बैलेट पेपर पर चुनाव चिन्ह के साथ प्रत्याशी का नाम भी अनिवार्य रूप से छापा जाए।
याचिकाकर्ताओं ने ग्रामीण मतदाताओं की दिक्कतों को आधार बनाकर यह याचिका दाखिल की है।
नाम छापने की मांग क्यों?
याचिका में कहा गया है कि ग्रामीण क्षेत्र के मतदाता सिर्फ चुनाव चिन्ह देखकर उम्मीदवार चुनने को मजबूर होते हैं, जिससे कई बार सही प्रत्याशी का चयन मुश्किल हो जाता है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि:
- वर्तमान में बैलेट पेपर पर सिर्फ चुनाव चिन्ह होता है, नाम नहीं, जिससे मतदाताओं को यह समझ ही नहीं आता कि वे किसके पक्ष में वोट कर रहे हैं।
- ग्रामीण मतदाताओं में पढ़ने–लिखने की कमी के कारण सिर्फ चुनाव चिन्ह से उम्मीदवार की पहचान करना मुश्किल होता है। नाम के साथ चिन्ह भी छपा हो, तो मतदाता आसानी से फैसला कर सकेंगे।
NOTA की मांग पर तर्क
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में NOTA (इनमें से कोई नहीं) का विकल्प उपलब्ध है, लेकिन पंचायत चुनावों में यह सुविधा नहीं है।
- अधिकार: ग्रामीण मतदाताओं को भी यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे यदि किसी भी उम्मीदवार को पसंद नहीं करते हैं तो सभी उम्मीदवारों को खारिज कर सकें।
- तकनीकी सुगमता: चूंकि पंचायत चुनाव बैलेट पेपर से ही कराए जाते हैं, इसलिए NOTA जोड़ने में कोई तकनीकी दिक्कत भी नहीं होगी।
हाईकोर्ट में आज होगी सुनवाई
इस मामले की सुनवाई आज लखनऊ पीठ में होगी। मामला न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध है। वहीं विस्तृत याचिका की सुनवाई चीफ जस्टिस दिवाकर प्रसाद सिंह और न्यायमूर्ति बृजेश सिंह की बेंच करेगी।
निर्वाचन आयोग ने किया विरोध
चुनाव आयोग ने याचिका पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि:
- चुनाव आयोग का दावा है कि त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों के लिए करीब 60 करोड़ बैलेट पेपर की जरूरत पड़ेगी, और ये मतपत्र पहले ही छप चुके हैं।
- आयोग का कहना है कि इस स्थिति में दोबारा मतपत्र छपवाना संभव नहीं है और इससे चुनाव समय पर कराना कठिन हो जाएगा।
हालांकि, याचिकाकर्ता पक्ष ने आयोग की इस दलील को गलत बताया है। उनका कहना है कि सभी मतपत्र अभी छपे ही नहीं हैं, और पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया के लिए नाम शामिल करना और NOTA जैसी सुविधा देना बेहद जरूरी है।