Premanand Maharaj Kidney Disease: प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज की तबीयत पिछले कुछ समय से ठीक नहीं चल रही है। बताया जा रहा है कि वह किडनी की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं, जिसके कारण उनकी रोजाना निकलने वाली तीर्थयात्रा को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है। इससे पहले भी उनकी तबीयत बिगड़ने पर यात्रा रोकनी पड़ी थी। इस बीच भक्त देश-विदेश से उनके शीघ्र स्वस्थ होने की प्रार्थना कर रहे हैं।
कौन सी बीमारी से जूझ रहे हैं प्रेमानंद महाराज?
रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रेमानंद महाराज को पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज (Polycystic Kidney Disease – PKD) है। यह एक जेनेटिक डिसऑर्डर (वंशानुगत बीमारी) है, जिसमें किडनी में छोटे-छोटे सिस्ट (थैलीनुमा गांठें) बनने लगते हैं। समय के साथ ये सिस्ट बड़े हो जाते हैं और किडनी की फिल्टर करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं।
प्रेमानंद महाराज ने अपने प्रवचनों में भी बताया था कि उनकी दोनों किडनियां खराब हैं, और उन्हें रोजाना डायलिसिस कराना पड़ता है।
पॉलीसिस्टिक किडनी डिजीज कितनी खतरनाक होती है?
PKD धीरे-धीरे बढ़ने वाली बीमारी है जो कई मामलों में किडनी फेल्योर (ESRD) तक पहुंच जाती है। इस बीमारी के दो प्रकार होते हैं —
- ADPKD (Adult Dominant Polycystic Kidney Disease) — जो अधिकतर वयस्कों को प्रभावित करती है।
- ARPKD (Autosomal Recessive Polycystic Kidney Disease) — यह काफी रेयर है और बच्चों में पाई जाती है।
इस बीमारी में ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है, यूरिन में खून आता है और बार-बार यूरिन इंफेक्शन जैसी समस्याएं देखने को मिलती हैं।
मौत का खतरा कितना होता है?
‘Aging US Journal’ की एक रिसर्च के मुताबिक, ADPKD मरीजों में मृत्यु का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में 1.6 से 3.2 गुना अधिक होता है।
वहीं PubMed की एक स्टडी के अनुसार, PKD मरीजों में मौत की दर तब 18.4 प्रति 1000 मरीज प्रति वर्ष होती है जब बीमारी शुरुआती अवस्था में हो, लेकिन जब यह किडनी फेल्योर (ESRD) तक पहुंच जाती है, तो यह दर बढ़कर 37.4 प्रति 1000 मरीज प्रति वर्ष हो जाती है।
US National Institute of Diabetes and Digestive and Kidney Diseases की रिपोर्ट बताती है कि अगर समय पर इलाज न मिले तो यह बीमारी अंततः किडनी फेल्योर का कारण बन सकती है, जिससे मौत का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
क्या इसका इलाज संभव है?
हालांकि PKD का कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन नियमित डायलिसिस, किडनी ट्रांसप्लांट, और समय पर मेडिकल मॉनिटरिंग से इसकी प्रगति को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन और एमआरआई से शुरुआती स्तर पर पहचान कर लक्षणों को बढ़ने से रोका जा सकता है।
(Disclaimer: यह जानकारी विशेषज्ञों की राय और चिकित्सा रिपोर्ट्स पर आधारित है। इसे मेडिकल सलाह का विकल्प न मानें। किसी भी उपचार या दवा को शुरू करने से पहले अपने चिकित्सक से परामर्श अवश्य लें।)