क्या अपना मन पहले ही बना चुका है मतदाता

सत्ता पक्ष और विपक्षी खेमे ने अगले लोकसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है। इसी सिलसिले में कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन यानी संप्रग ने अपना चोला बदलकर आइएनडीआइए का रूप धारण कर लिया है। क्या यह चोला बदलना चुनावी सफलता में भी परिणत हो पाएगा? क्या पिछले दो चुनावों में एक के बाद एक मानमर्दन झेलने वाली कांग्रेस पार्टी की संभावनाएं बेहतर होंगी?नि:संदेह, रणनीतिक तौर पर तो आइएनडीआइए के सहयोगियों ने एक प्रकार से कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार कर लिया है, पर राहुल गांधी को संयुक्त विपक्ष का प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी घोषित करने को लेकर ऊहापोह कायम है। शायद इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता एक पहलू है।पिछले दो लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने भाजपा से सीधे मुकाबले वाली 80 प्रतिशत से अधिक सीटें गंवाई हैं। यहां तक कि मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव हारने के कुछ महीनों बाद हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा इन राज्यों की 90 प्रतिशत से अधिक सीटें जीत गई। वर्ष 2019 में सत्ता विरोधी रुझान के बावजूद भाजपा 2014 की तुलना में कहीं अधिक सीटें जीतने में सफल रही। ऐसे में इस बार भी कांग्रेस के लिए इस रुझान को पलटना खासा मुश्किल होगा।प्रधानमंत्री मोदी ने वंचित वर्ग के लिए प्रभावी कल्याणकारी योजनाओं, विश्वपटल पर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ाने और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की त्रयी से सफलता का यह मंत्र रचा है। फिलहाल, इस त्रिवेणी की किसी भी धारा के प्रवाह पर कोई संकट नहीं दिखता। पार्टी से इतर गठबंधन की बात करें तो इस मोर्चे पर भी आइएनडीआइए की तुलना में भाजपा के नेतृत्व वाला राजग कहीं ज्यादा दमदार दिखता है। राजग के सहयोगियों में जहां मतों के हस्तांतरण की क्षमता अधिक है वहीं आइएनडीआइए में साझेदार दल एक ही वर्ग के वोटों के लिए प्रतिस्पर्धा में लगे हैं।जहां तक भाजपा का प्रश्न है तो अगले चुनाव में उसकी संभावनाएं बिहार, महाराष्ट्र और बंगाल में उसके प्रदर्शन पर बड़ी हद तक निर्भर करेंगी। बिहार में पार्टी के लिए कमोबेश वैसी ही स्थिति है जैसी 2014 के चुनाव में थी। नीतीश कुमार की खिसकती राजनीतिक जमीन और छोटे-छोटे सहयोगियों के साथ भाजपा यहां 2014 का अपना प्रदर्शन दोहरा सकती है। वहीं, महाराष्ट्र में अजीत पवार के नेतृत्व वाले राकांपा के धड़े के भाजपा से जुड़ने के बाद उद्धव गुट वाली शिवसेना की वजह से होने वाले संभावित नुकसान की भरपाई हो सकती है।मोदी-शाह की जोड़ी वह गलतियां नहीं दोहराएगी जो अटल बिहारी वाजपेयी और उनके सहयोगियों ने की थीं। तब भाजपा केवल ‘भारत उदय’ नारे के चलते ही नहीं हारी थी, बल्कि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह और मायावती को लेकर गलत आकलन ने भी उसके समीकरण खराब किए थे। इन सबसे बढ़कर प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी कल्याणकारी योजनाओं और लक्षित लाभार्थियों तक पहुंच से अपना एक विशेष वोट बैंक बनाया है। दूसरी ओर, विपक्ष अभी भी दिशाहीन और निस्तेज दिखता है। इससे यही लगता है कि भारतीय मतदाता 2024 के चुनाव के लिए अपना मन पहले ही बना चुका है।

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