यूक्रेन और रूस के बीच लंबे समय से जारी युद्ध अब अमेरिकी राजनीति के केंद्र में है। अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का रुख अचानक बदला हुआ नजर आ रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक ट्रंप ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की से रूस पर हमले तेज करने की बात कही है। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब उन्होंने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के खिलाफ सख्त तेवर अपना लिए हैं।
“क्या मॉस्को पर हमला करोगे?” — ट्रंप का सवाल
ब्रिटेन के अखबार फाइनेंशियल टाइम्स की एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि ट्रंप ने निजी बातचीत में जेलेंस्की से पूछा, “अगर मैं तुम्हें हथियार दूं तो क्या तुम मॉस्को पर हमला करोगे?… क्या तुम सेंट पीटर्सबर्ग को भी निशाना बना सकते हो?” इस पर जेलेंस्की ने जवाब दिया, “बिल्कुल। अगर आप हमें हथियार देंगे तो हम ऐसा कर सकते हैं।” यह संवाद 4 जुलाई को हुआ बताया जा रहा है।
पुतिन से बातचीत के बाद आया बदला रुख
ट्रंप की यह टिप्पणी ऐसे समय पर आई है जब एक दिन पहले ही पुतिन से उनकी कड़ी बातचीत हुई थी। सूत्रों का कहना है कि ट्रंप ने बातचीत के बाद पुतिन के प्रति नाराजगी जताते हुए उन्हें ‘बुरा’ कहा। यह पहली बार नहीं है जब ट्रंप ने पुतिन के खिलाफ ऐसी सख्ती दिखाई हो — इससे पहले भी उन्होंने रूस को 50 दिनों के भीतर युद्ध समाप्त न करने पर 100% टैरिफ लगाने की चेतावनी दी थी।
यूक्रेन पर चढ़ाई की रणनीति: ट्रंप का नया दांव
रिपोर्ट में कहा गया है कि ट्रंप अब यूक्रेन को मजबूती से हथियार देकर रूस के अंदर घुसकर हमले करने की रणनीति बनाना चाहते हैं। इस नई सोच का कारण पुतिन का युद्धविराम प्रस्तावों को खारिज करना और जवाब देने से बचना बताया जा रहा है। ट्रंप की यह योजना उनकी उस पुरानी घोषणा से बिल्कुल विपरीत है, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि वो सत्ता में आते ही 24 घंटे में रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करवा देंगे।
यूक्रेन की स्थिति नाजुक, रूस के कब्जे में 20% हिस्सा
गौरतलब है कि यूक्रेन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इस समय रूस के कब्जे में है। विश्लेषकों का मानना है कि यूक्रेनी सेना की स्थिति दिनों-दिन कमजोर हो रही है। बावजूद इसके फ्रंटलाइन पर हार मानने का कोई संकेत नजर नहीं आता।
निष्कर्ष: क्या बदलता ट्रंप का रुख युद्ध का रुख भी बदलेगा?
डोनाल्ड ट्रंप का यूक्रेन को हथियार देने और रूस पर हमले की छूट देने का संकेत विश्व राजनीति में नए मोड़ की ओर इशारा कर रहा है। अब देखना ये है कि क्या यह बयानबाज़ी मात्र है या वाकई अमेरिकी नीतियों में बड़ा बदलाव आने वाला है।