मतदाता सूची के स्पेशल इन्टेंसिव रिवीजन (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है। याचिकाकर्ता आरजेडी सांसद मनोज झा की तरफ से पेश सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल ने बुधवार (26 नवंबर, 2025) को इस प्रक्रिया को ‘व्यावहारिक रूप से अनुचित’ बताते हुए कई गंभीर सवाल उठाए।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच के सामने सिब्बल ने नागरिकता साबित करने के दायित्व और बूथ स्तरीय अधिकारियों (BLO) की भूमिका पर आपत्ति दर्ज कराई।
नागरिकता साबित करने का बोझ
कपिल सिब्बल ने दलील दी कि एसआईआर में लागू किए जा रहे नियम विदेशी (नागरिक) अधिनियम के नियमों जैसे ही हैं, जहां नागरिकता साबित करने का दायित्व व्यक्ति पर है कि वह विदेशी नहीं है।
उन्होंने पूछा:
- दस्तावेज की मांग: वोटर को बर्थ सर्टिफिकेट या ऐसा दस्तावेज देना होगा, जो साबित करता हो कि उसके माता-पिता में से कोई एक भारतीय हैं।
- अव्यावहारिक सवाल: उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा, “गणनाकर्ता वोटर से पूछेगा, मुझे बताइए आपके पिता का जन्म कब हुआ? मुझे इसका सबूत दीजिए… मैं इसका प्रमाण कैसे दे पाऊंगा?”
- मृत्यु की स्थिति: “मैं यह दायित्व कैसे निभाऊंगा जब मेरे पिता ने 2003 की मतदाता सूची के तहत वोट नहीं दिया था या उनकी मृत्यु उससे पहले हो गई थी?”
BLO की शक्तियों पर आपत्ति
कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि नागरिकता तय करना स्कूल शिक्षकों (जो BLO नियुक्त हैं) के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है:
“कोई वोटर भारतीय नागरिक है या नहीं, ये तय करना बीएलओ के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता है, क्योंकि जो बीएलओ नियुक्त किए गए हैं, वो सिर्फ स्कूल टीचर्स हैं।”
उन्होंने कहा, “नागरिकता निर्धारित करने के लिए एक स्कूल शिक्षक को बीएलओ के रूप में तैनात करना, मूल रूप से और प्रक्रियात्मक रूप से एक खतरनाक और अनुचित प्रस्ताव है।”
CJI ने कहा- ‘आप चूक गए’
सिब्बल की दलीलों पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा:
“लेकिन अगर आपके पिता का नाम सूची में नहीं है और आपने भी इस पर काम नहीं किया… तो शायद आप चूक गए…”
कोर्ट अब 2 दिसंबर को इस मामले पर सुनवाई करेगा।