सनातनके अपमान की राजनीति

तमिलनाडु के मुख्य मंत्री एमके स्टालिन के बेटे और मंत्री उदयनिधि स्‍टालिन ने सनातन धर्म को डेंगू और मलेरिया बताते हुए यह जो कहा कि उसका विरोध नहीं, बल्कि पूरी तरह खात्मा कर दिया जाना चाहिए, उस पर भाजपा के साथ हिंदू संगठनों की तीखी प्रतिक्रिया होनी ही थी। इसके बाद भी वह अपने बयान पर कायम हैं। उदयनिधि के बाद उन्हीं की पार्टी यानी द्रमुक के एक अन्य नेता एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री ए. राजा ने सनातन धर्म को एड्स और कुष्ठ रोग जैसा करार दिया। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म केवल भारत के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए खतरा है।आश्चर्य यह है कि एमके स्टालिन समेत द्रमुक के अन्य नेता उदयनिधि के बयान को सही ठहरा रहे हैं। साफ है कि इसके चलते यह मुद्दा शांत होने वाला नहीं। उदयनिधि के बेतुके और भड़काऊ बयान का संज्ञान खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लिया और यह कहा कि इसका समुचित जवाब दिया जाना चाहिए। उन्होंने बीते दिनों मध्य प्रदेश में एक सभा को संबोधित करते हुए विपक्षी दलों के गठबंधन आइएनडीआइए पर यह कहते हुए प्रहार किया कि यह गठजोड़ भारत की उन पंरपराओं, विचारों और संस्कृति को खंड-खंड करना चाहता है, जिसने हजारों वर्षों से देश को जोड़े रखा है।तुष्टिकरण की राजनीति के तहत जब भी किसी दल ने भारतीय सभ्‍यता और संस्‍कृति पर बेजा टिप्पणियां कीं, उनकी हिंदू समाज के साथ भाजपा ने निंदा की। हिंदुत्व तो भाजपा के डीएनए में है। इसी कारण उसने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए शुरू किए गए आंदोलन का खुलकर समर्थन किया। भाजपा विरोधी दल भले ही अपने एजेंडे के तहत हिंदुत्व को कठघरे में खड़ा करते रहे हों, लेकिन भाजपा ने उससे कभी समझौता नहीं किया। उसने उसे राजनीतिक चश्मे से भी नहीं देखा।सनातन संस्कृति हजारों वर्ष पुरानी है। उसके धार्मिक ग्रंथों में कहीं पर भी जातिवाद, छूआछूत आदि की बातें नहीं की गईं, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि परिस्थितियों के चलते हिंदू समाज में जातिवाद घर कर गया और छूआछूत की भावना भी फैली। इसके चलते दलित कही जाने वाली जातियों को मंदिरों में प्रवेश करने से रोका गया। हिंदू समाज ने इन विसंगतियों को दूर करने की पहल स्वयं की। इन विसंगतियों और बुराइयों से हिंदू समाज ने आजादी के पहले से ही लड़ना शुरू कर दिया था। इसी कराण जातिगत भेदभाव और छूआछूत के खिलाफ कानून बनाए गए। यह लड़ाई अब भी जारी है और उसे जारी रखने की आवश्यकता भी है।इससे समाज में एक तरह का विभाजन पैदा हुआ और इन दलों ने इसका राजनीतिक लाभ उठाया। यह स्पष्ट है कि द्रमुक नेता राजनीतिक कारणों से ही सनातन धर्म पर बेजा और उकसावे वाली टिप्पणियां कर रहे हैं। हो सकता है कि सनातन धर्म पर द्रमुक नेताओं के भड़काऊ बयानों से उन्हें तमिलनाडु में कुछ राजनीतिक लाभ मिल जाए, लेकिन उनके कारण शेष देश में आइएनडीआइए की कठिनाई बढ़ने वाली है।

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