पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POJK) में हालात लगातार विस्फोटक होते जा रहे हैं। महंगाई, बेरोजगारी, बिजली संकट और प्रशासनिक नीतियों के खिलाफ शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन अब बड़े हिंसक टकराव में बदल चुका है। प्रदर्शनकारियों और पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के बीच हुई झड़पों के बाद कई लोगों के मारे जाने और सैकड़ों के घायल होने के दावे किए जा रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचा है और भारत ने मामले को मानवाधिकारों से जोड़ते हुए संयुक्त राष्ट्र से हस्तक्षेप की मांग की है।
JAAC पर प्रतिबंध के बाद भड़का जनआक्रोश
POJK में मौजूदा संकट की शुरुआत 5 जून 2026 को हुई, जब प्रशासन ने ज्वाइंट अवामी एक्शन कमेटी (JAAC) पर प्रतिबंध लगा दिया। यह संगठन पिछले दो वर्षों से क्षेत्र में बढ़ती महंगाई, बिजली कटौती और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि के खिलाफ आंदोलन चला रहा था।
JAAC की कुल 38 मांगों में से प्रशासन ने अधिकांश मांगें स्वीकार कर ली थीं, लेकिन विधानसभा की 12 आरक्षित शरणार्थी सीटों को समाप्त करने की मांग पर सहमति नहीं बनी। संगठन का आरोप है कि इन सीटों का इस्तेमाल राजनीतिक प्रभाव बनाए रखने के लिए किया जाता है। प्रतिबंध लगने के बाद विरोध प्रदर्शन तेज हो गए और 6 जून को पुलिस कार्रवाई के दौरान एक व्यापारी की मौत के बाद स्थिति और तनावपूर्ण हो गई।
रावलाकोट में हिंसा ने बदली हालात की तस्वीर
8 जून को रावलाकोट में JAAC समर्थकों द्वारा बड़े पैमाने पर प्रदर्शन किया गया। इसी दौरान सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक टकराव हुआ। स्थानीय संगठनों और विभिन्न रिपोर्टों में आरोप लगाया गया कि प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की गई, जिससे बड़ी संख्या में लोग हताहत हुए।
घटना के बाद कई इलाकों में इंटरनेट और संचार सेवाएं प्रभावित होने की खबरें सामने आईं, जिससे हालात की स्वतंत्र पुष्टि करना मुश्किल हो गया। अस्पतालों में बड़ी संख्या में घायलों के पहुंचने की भी जानकारी दी गई है।
मौतों के आंकड़ों पर अलग-अलग दावे
हिंसा में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए हैं।
पाकिस्तानी प्रशासन के अनुसार, घटनाओं में 7 नागरिकों और 4 पुलिसकर्मियों समेत कुल 11 लोगों की मौत हुई है, जबकि 70 से अधिक लोग घायल हुए हैं।
वहीं JAAC और स्थानीय सूत्रों का दावा है कि मृतकों की संख्या 27 से अधिक है और 200 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। कुछ रिपोर्टों में इससे भी अधिक हताहतों की आशंका जताई गई है।
संचार सेवाओं पर प्रतिबंध और सीमित स्वतंत्र पहुंच के कारण इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल संभव नहीं हो पाई है।
फारूक अब्दुल्ला ने UNHRC से की हस्तक्षेप की अपील
नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष Farooq Abdullah ने POJK की स्थिति पर चिंता जताते हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) से हस्तक्षेप की मांग की है।
उन्होंने कहा, ‘पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहा है. वहां अत्याचार हो रहे हैं. अब तक बहुत सारे लोग शहीद हो चुके हैं. मैं संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) से अपील करूंगा कि वह वहां जाकर देखे कि उन लोगों पर क्या मुसीबतें टूट रही हैं. बातचीत का रास्ता ही इकलौता हल है.’
फारूक अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि क्षेत्र के लोगों की समस्याओं को नजरअंदाज करना लंबे समय में गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है।
POJK सरकार के रुख में दिखा बदलाव
POJK के प्रधानमंत्री Faisal Mumtaz Rathore ने शुरुआती दिनों में JAAC को लेकर कड़ा रुख अपनाया था। उन्होंने संगठन के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई की बात कही थी और बातचीत की संभावना से इनकार किया था।
हालांकि अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने और हिंसा की घटनाओं के बाद उन्होंने बाद में बातचीत के संकेत दिए। उन्होंने कहा कि विवादित मुद्दों पर बातचीत के जरिए समाधान निकाला जा सकता है। इसके बावजूद पाकिस्तान के केंद्रीय नेतृत्व और सुरक्षा प्रतिष्ठान की ओर से सख्त रुख बनाए रखने के संकेत मिलते रहे।
भारत ने अंतरराष्ट्रीय जांच की उठाई मांग
भारत ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश तेज कर दी है। कश्मीरी सामाजिक कार्यकर्ता जावेद बेग द्वारा संयुक्त राष्ट्र सैन्य पर्यवेक्षक समूह (UNMOGIP) को ज्ञापन सौंपे जाने की खबरें सामने आई हैं, जिसमें स्वतंत्र जांच की मांग की गई है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी पाकिस्तान पर निशाना साधते हुए कहा कि POJK में पुलिस कार्रवाई और मानवाधिकार उल्लंघनों से जुड़ी गंभीर रिपोर्टें सामने आ रही हैं। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इन घटनाओं पर ध्यान देने और जवाबदेही सुनिश्चित करने की अपील की।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठ रही आवाजें
POJK की घटनाओं को लेकर कई मानवाधिकार संगठनों और विदेशी राजनीतिक समूहों ने चिंता जताई है। ब्रिटेन में प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं, जबकि कुछ मानवाधिकार संगठनों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की आलोचना की है।
विभिन्न संगठनों का कहना है कि क्षेत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राजनीतिक अधिकारों और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के अधिकारों का सम्मान किया जाना चाहिए।
चुनाव और CPEC के कारण बढ़ी संवेदनशीलता
विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल कानून-व्यवस्था का नहीं बल्कि राजनीतिक और रणनीतिक महत्व भी रखता है। जुलाई 2026 में प्रस्तावित चुनावों और विवादित 12 शरणार्थी सीटों के मुद्दे ने राजनीतिक तनाव बढ़ा दिया है।
इसके अलावा, चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) भी इसी क्षेत्र से होकर गुजरता है। ऐसे में लंबे समय तक जारी अस्थिरता क्षेत्रीय राजनीति और आर्थिक परियोजनाओं पर असर डाल सकती है।
फिलहाल तनाव बरकरार
JAAC ने आगे भी विरोध प्रदर्शन जारी रखने के संकेत दिए हैं, जबकि सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ा दी गई है। ऐसे में क्षेत्र में तनाव कम होने के बजाय और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। आने वाले दिनों में प्रशासन, प्रदर्शनकारियों और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करेगी।