
विपक्ष ने कई महीने पहले जोर-शोर से एक गठबंधन बनाया था और उसका नाम INDIA रखा गया। इस गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर कांग्रेस के कंधों पर यह जिम्मेदारी थी कि वह सबको साथ लेकर चले और सीट बंटवारे की बात करे।बेंगलुरु, मुंबई और पटना की बैठकों में इसे लेकर विपक्षी दलों ने मांग भी उठाई। कश्मीर से केरल तक के दल इन मीटिंगों का हिस्सा थे और माहौल भी बना, लेकिन कांग्रेस ने सीट बंटवारे की मांगों को टाल दिया था। तब कहा जा रहा था कि कांग्रेस अपनी बारगेनिंग पावर बढ़ाना चाहती है। शायद उसे लगता था कि यदि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसे सत्ता मिली तो माहौल उसके पक्ष में होगा।
ऐसी स्थिति में वह सहयोगी दलों से सीट बंटवारे में मजबूती से बात रख सकेगी। यही वजह थी कि वह सीट बंटवारे की मांगों को टाल रही थी। अब शायद कांग्रेस को वही दांव भारी पड़ रहा है और तीन राज्यों में उसकी करारी हार के बाद यूपी में अखिलेश, बिहार में नीतीश कुमार और बंगाल में ममता बनर्जी उसका फायदा उठाने में जुटे हैं। तीनों नेताओं ने 6 दिसंबर को बुलाई गई मीटिंग में आने से ही इनकार कर दिया था। तीनों दल छोटे नेताओं को भेजने की बात कर रहे थे। इससे दबाव में आई कांग्रेस ने अब मीटिंग को ही स्थगित करने का फैसला लिया है।
माना जा रहा है कि तीनों नेताओं ने मीटिंग में न जाने की बात इसलिए कही है ताकि कांग्रेस पर उसका ही दांव आजमा सकें। अखिलेश यादव तो पहले ही कहते रहे हैं कि जो दल जहां मजबूत है, वही अपने राज्य में सीटों के बंटवारे पर फैसला लेगा। इसके अलावा ममता बनर्जी ने सबसे पहले इस संबंध में कांग्रेस को नसीहत दी थी और कहा था कि उसे त्याग करना चाहिए। क्षेत्रीय दल जहां मजबूत हैं, वहां उन्हें अधिक सीटें मिलनी चाहिए। अब नीतीश कुमार की पार्टी भी कांग्रेस को दबाव में लेने के मूड में है।
अब नीतीश भी लेने लगे बदला, उन्हें थी संयोजक बनने की उम्मीद?
दरअसल तीन मीटिंगें जब हुईं तो नीतीश कुमार खुद को संयोजक बनवाना चाहते थे। ऐसी चर्चाएं थीं, लेकिन अंत में कई संयोजक बनाए गए। इससे नीतीश कुमार को झटका लगा था और अब जब कांग्रेस तीन राज्यों में हार के बाद बैकफुट पर है तो वह उसे भुनाने में जुटे हैं। जेडीयू नेता विजय चौधरी ने तो सोमवार को ही कह दिया था कि गठबंधन को विश्वसनीय चेहरे की जरूरत है। वह चेहरा नीतीश कुमार हो सकते हैं।