ईरान में सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई के शासन के खिलाफ चले लंबे और हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बाद अब सड़कों पर शांति लौट आई है। हालांकि, हिंसा के डर से कई प्रवासी अभी भी देश छोड़कर जा रहे हैं, लेकिन जनजीवन धीरे-धीरे सामान्य हो रहा है। इस बीच, अल मुस्तफ़ा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और पश्चिम एशिया मामलों के जानकार ज़मीर अब्बास जाफ़री ने ABP से बातचीत में ईरान के मौजूदा हालात की जमीनी हकीकत बयां की है। उन्होंने बताया कि दुनिया को मीडिया के जरिए जो तस्वीर दिखाई जा रही है, असलियत उससे काफी अलग है।
सरकार के समर्थन में सड़कों पर उतरे करोड़ों लोग
ईरान के कुम शहर में रह रहे भारतीय मूल के प्रोफेसर ज़मीर अब्बास जाफ़री ने बताया कि 12 जनवरी को सरकार के समर्थन और आतंकवाद के खिलाफ विशाल प्रदर्शन हुआ, जिसके बाद सरकार विरोधी लहर कमजोर पड़ गई।
उन्होंने कहा, “ईरान के अंदर सरकार के समर्थन में एक करोड़ से ज्यादा लोग आए थे, सिर्फ तेहरान में 30 लाख से ज्यादा लोग आए थे. इसके 3 मकसद थे; पहला गवर्नमेंट को इकोनॉमी के प्रॉब्लम के लिए कहना था कि हमें प्रॉब्लम है, उसे सॉल्व करना है. दूसरा हम टेररिज़म के मुखालिफ (विरोधी) हैं, तीसरा अमेरिका और इजरायल को हम जानते हैं कि ये दुश्मन है और इनकी साजिशों से हम आगाह हैं.”
महंगाई और विदेशी साजिश का दावा
हिंसा की शुरुआत और इसके पीछे के कारणों पर बात करते हुए जाफ़री ने अमेरिका और इजरायल की भूमिका की ओर इशारा किया।
उन्होंने बताया, “ईरान में सरकार के खिलाफ दिसंबर के आखिरी हफ्ते में प्रोटेस्ट शुरू हुआ. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की मुलाकात होती है. उसी दौरान ईरान की करेंसी को 30-40 फीसदी गिरा दिया गया. अमेरिका ने ईरान में प्रेशर क्रिएट किया और यहां महंगाई 30-40 फीसदी बढ़ गई ईरान के अंदर इकनॉमिक समस्या बढ़ गई. चीजों की कीमत बढ़ने की वजह से लोगों में नाराजगी होती है और इसी का फायदा देख इजरायल ईरान के अंदर घुसना चाहता था.”
हिंसा भड़कते ही आम जनता ने बनाई दूरी
जाफ़री ने स्पष्ट किया कि जब प्रदर्शनों में उपद्रवी तत्व शामिल हो गए, तो आम ईरानी नागरिकों ने खुद को आंदोलन से अलग कर लिया।
उन्होंने कहा, “जब जायज प्रदर्शन होते हैं तब उसी में नकाबपोश लोग दाखिल होते हैं और प्रोटेस्ट के अंदर हिंसा करना शुरू कर देते हैं. रिजल्ट ये होता है कि ईरान कि आवाम आहिस्ते आहिस्ते इस हिंसा से दूर हो जाते हैं… तकरीबन 50 से ज्यादा मस्जिद को जला दी जाती है. इमामबारगाहों को जलाया जाता है. बैंकों पर हमला होता है. शॉपिंग सेंटर पर हमला होता है… इस हमले में 100 ज्यादा गवर्नमेंट ऑफिशियल मारे जाते हैं.”
कूटनीति से टला बड़ा युद्ध
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन प्रदर्शनों में करीब 3,000 लोगों की मौत हुई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान पर हमले की चेतावनी दी थी, लेकिन कतर, ओमान, सऊदी अरब और मिस्र जैसे देशों के कूटनीतिक हस्तक्षेप के बाद युद्ध का खतरा टल गया। इन देशों ने अमेरिका को आगाह किया था कि हमले से क्षेत्र में गंभीर सुरक्षा और आर्थिक संकट पैदा हो जाएगा। फिलहाल, कूटनीतिक प्रयासों के चलते ईरान में शांति कायम है।