लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मंगलवार (12 अगस्त, 2025) को इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ लाए गए महाभियोग प्रस्ताव के नोटिस को स्वीकार कर लिया है। भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की जांच के लिए स्पीकर ने तीन सदस्यीय समिति गठित की है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अरविंद कुमार, हाई कोर्ट के जस्टिस मनिंदर मोहन श्रीवास्तव और वरिष्ठ अधिवक्ता वी. बी. आचार्य शामिल हैं।
भ्रष्टाचार और आचरण से जुड़े गंभीर आरोप
महाभियोग प्रस्ताव में जस्टिस वर्मा पर आचरण और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। यह प्रस्ताव सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों खेमों के सांसदों ने मिलकर पेश किया, जिसे संसदीय नियमों के तहत स्वीकार किया गया। समिति को जल्द अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को सौंपने के निर्देश दिए गए हैं।
आग में जली नोटों की गड्डियों से शुरू हुआ मामला
मार्च 2025 में दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास पर आग लगी थी। मौके पर पहुंचे दमकल और पुलिस कर्मियों को स्टोर रूम व परिसर के आसपास जली और आधी जली 500 रुपये की नोटों की गड्डियां मिलीं। NDMC सफाईकर्मियों ने भी आसपास कचरे से जले नोटों के टुकड़े मिलने की पुष्टि की। घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने एक जांच समिति बनाई, जिसकी रिपोर्ट सरकार को आगे की कार्रवाई के लिए भेजी गई।
महाभियोग की प्रक्रिया
संसदीय नियमों के मुताबिक, समिति अपनी जांच पूरी कर रिपोर्ट स्पीकर को सौंपेगी। आरोप सही पाए जाने पर प्रस्ताव लोकसभा में पेश होगा, जहां बहस और मतदान होगा। चर्चा के दौरान जस्टिस वर्मा को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिलेगा। यदि आवश्यक बहुमत से प्रस्ताव पारित होता है, तो आगे की संवैधानिक प्रक्रिया लागू होगी।
महाभियोग का अब तक का इतिहास
अब तक देश में केवल दो मामलों में महाभियोग प्रस्ताव गंभीरता से संसदीय प्रक्रिया तक पहुंचा है। 1993 में जस्टिस वी. रामा स्वामी के खिलाफ प्रस्ताव आवश्यक बहुमत न मिलने से खारिज हो गया था। वहीं, 2011 में जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ राज्यसभा ने प्रस्ताव पारित किया, लेकिन लोकसभा में मतदान से पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।