चीन ने तिब्बत क्षेत्र में यारलुंग त्सांगपो नदी पर एक विशाल हाइड्रोइलेक्ट्रिक डैम परियोजना के निर्माण को तेज कर दिया है। यह परियोजना भारत-चीन सीमा से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बताई जा रही है। इस विकास के बाद भारत की चिंताएं एक बार फिर बढ़ गई हैं, क्योंकि इस तरह के बड़े बांधों का असर नदी के निचले क्षेत्रों पर लंबे समय तक पड़ सकता है।
सीमा के करीब बन रहा है मेगा डैम
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, चीन ने तिब्बत में यारलुंग त्सांगपो नदी के निचले हिस्से में हाइड्रोइलेक्ट्रिक डैम का निर्माण कार्य शुरू कर दिया है। भारतीय एजेंसियों द्वारा सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण किए जाने के बाद इस परियोजना की प्रगति सामने आई है। रिपोर्टों के मुताबिक, हाल के महीनों में निर्माण गतिविधियों में उल्लेखनीय तेजी देखी गई है।
ब्रह्मपुत्र के जल प्रवाह पर पड़ सकता है असर
यारलुंग त्सांगपो नदी तिब्बत से निकलकर अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करती है, जहां इसे सियांग नदी के नाम से जाना जाता है। आगे चलकर यही नदी असम में ब्रह्मपुत्र के रूप में बहती है और लाखों लोगों की जल आवश्यकताओं को पूरा करती है।
अधिकारियों के अनुसार, भारत सरकार इस परियोजना पर लगातार नजर बनाए हुए है। विशेषज्ञों का मानना है कि नदी के ऊपरी हिस्से में बड़े पैमाने पर बांध निर्माण होने से पानी के प्राकृतिक प्रवाह पर प्रभाव पड़ सकता है। इसके साथ ही निचले इलाकों में बाढ़ के पैटर्न में बदलाव आने की आशंका भी जताई गई है।
रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है परियोजना
विशेषज्ञों का कहना है कि इस परियोजना का महत्व केवल पर्यावरणीय या जल संसाधन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका रणनीतिक पहलू भी बेहद अहम है। उनका मानना है कि नदी के ऊपरी हिस्से में बने बड़े बांध किसी भी तनावपूर्ण स्थिति में चीन को अतिरिक्त बढ़त दे सकते हैं, क्योंकि इससे जल प्रवाह को नियंत्रित करने की क्षमता बढ़ जाती है।
संसद में सरकार ने जताई थी चिंता
पिछले वर्ष संसद में पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में विदेश मामलों के राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह ने कहा था कि केंद्र सरकार इस मेगा डैम से जुड़ी रिपोर्टों पर ध्यान दे रही है। उन्होंने बताया था कि सरकार लंबे समय से प्रस्तावित इस परियोजना की निगरानी कर रही है और ब्रह्मपुत्र नदी से जुड़े सभी घटनाक्रमों पर सावधानीपूर्वक नजर रखती है।
उन्होंने कहा कि सरकार ब्रह्मपुत्र नदी से संबंधित सभी घटनाक्रमों पर सावधानीपूर्वक नजर रखती है, जिसमें चीन की ओर से हाइड्रोइलेक्ट्रिक डैम को विकसित करने की योजना भी शामिल है।
चीन के सामने कई बार उठाया गया मुद्दा
सरकार ने आधिकारिक माध्यमों से कई बार चीन के समक्ष अपनी चिंताएं दर्ज कराई हैं। सीमा पार नदियों से जुड़े मामलों पर वर्ष 2006 में स्थापित एक्सपर्ट लेवल मैकेनिज्म के तहत दोनों देशों के बीच चर्चा भी होती रही है।
रिपोर्टों के अनुसार, जुलाई 2025 में शंघाई सहयोग संगठन के विदेश मंत्रियों की बैठक के लिए विदेश मंत्री एस. जयशंकर की चीन यात्रा के दौरान भी यह मुद्दा उठाया गया था।
चीन का दावा, भारत को नहीं होगा नुकसान
बीजिंग का कहना है कि यह हाइड्रोइलेक्ट्रिक डैम मुख्य रूप से बिजली उत्पादन के उद्देश्य से विकसित किया जा रहा है और इससे भारत के हितों को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। हालांकि, भारत इस मामले में सतर्क रुख अपनाए हुए है और संभावित जोखिमों को देखते हुए परियोजना पर करीबी नजर बनाए हुए है।