उत्तर प्रदेश के वाराणसी यानी काशी में धार्मिक सौहार्द और साझा विरासत की पहचान रही एक पुरानी परंपरा को लेकर निराशा जताई जा रही है। लाट भैरव चबूतरे पर करीब 450 वर्षों से रामलीला के मंचन और नमाज अदा किए जाने की परंपरा चली आ रही थी। स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस वर्ष रामलीला तो आयोजित हुई, लेकिन नमाज अदा करने के लिए नमाजी नहीं पहुंचे। इस घटनाक्रम के बाद काशी की गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल मानी जाने वाली इस परंपरा के भविष्य को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
लाट भैरव चबूतरे पर रामलीला और नमाज की रही है परंपरा
एबीपी लाइव की ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, स्थानीय लोगों का कहना है कि वाराणसी के लाट भैरव चबूतरे पर सदियों से रामलीला और नमाज के आयोजन साथ-साथ होते रहे हैं। सूर्यास्त के समय चबूतरे के एक ओर रामलीला के कलाकार रामचरितमानस की चौपाइयों के साथ मंचन करते थे, जबकि दूसरी ओर नमाज अदा की जाती थी।
स्थानीय लोगों के मुताबिक, दोनों समुदायों के लोग एक-दूसरे की धार्मिक परंपराओं का सम्मान करते हुए इन आयोजनों में शामिल होते थे। इस अनूठी व्यवस्था को काशी में आपसी सौहार्द और साझा सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक के रूप में देखा जाता रहा है।
इस बार रामलीला हुई, लेकिन नमाज के लिए नहीं पहुंचे नमाजी
इस वर्ष लाट भैरव चबूतरे पर रामलीला का आयोजन किया गया, लेकिन नमाज अदा करने के लिए नमाजी नहीं पहुंचे। स्थानीय लोगों के अनुसार, ऐसा पहली बार हुआ है। इसके बाद क्षेत्र में इस बात को लेकर चर्चा शुरू हो गई कि सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपरा में इस बार बदलाव क्यों आया।
रामलीला आयोजन समिति के सदस्यों ने भी इस घटनाक्रम पर दुख जताया है। हालांकि, नमाज नहीं होने के पीछे की वजह को लेकर अलग-अलग दावे सामने आ रहे हैं और इस संबंध में कोई स्पष्ट कारण सामने नहीं आया है।
परंपरा टूटने के पीछे क्या वजह बताई जा रही है?
स्थानीय लोगों के बीच इस मुद्दे को लेकर अलग-अलग राय सामने आ रही हैं। कुछ लोगों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में यहां नए आयोजन शुरू हुए हैं, जिनको लेकर दूसरे समुदाय के लोगों के बीच असहजता की स्थिति बनी हो सकती है। उनका दावा है कि पहले दोनों धर्मों के लोग एक-दूसरे की परंपराओं का सम्मान करते हुए निर्धारित मर्यादाओं का पालन करते थे।
कुछ स्थानीय लोगों ने यह आशंका भी जताई कि नए आयोजनों को लेकर पैदा होने वाला विवाद आपसी सौहार्द को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, इन दावों पर दूसरे पक्ष की ओर से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इसलिए नमाजियों के नहीं पहुंचने की वास्तविक वजह की पुष्टि नहीं हो सकी है।
काशी में साझा विरासत को लेकर लोगों में निराशा
लाट भैरव चबूतरे की यह परंपरा काशी की उस सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी रही है, जिसमें अलग-अलग धर्मों के लोग एक-दूसरे की आस्थाओं और आयोजनों का सम्मान करते आए हैं। इस बार रामलीला के साथ नमाज नहीं होने से स्थानीय लोगों में निराशा है।
करीब 450 वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को आगे भी जारी रखने के लिए किसी ठोस पहल की जानकारी सामने नहीं आई है। अब सवाल यह है कि क्या स्थानीय स्तर पर बातचीत और आपसी सहमति के जरिए इस साझा विरासत को फिर से उसी रूप में आगे बढ़ाया जा सकेगा।