कर्नाटक में MLA-MLC को कैबिनेट दर्जा देने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, CJI ने सुनवाई से किया इनकार

कर्नाटक सरकार द्वारा विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को कैबिनेट दर्जा दिए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। हालांकि, शीर्ष अदालत ने इस मामले में सुनवाई करने से इनकार करते हुए याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट में पुनरीक्षण याचिका दाखिल करने की सलाह दी है। इस फैसले के बाद राज्य सरकार के उस आदेश को लेकर फिर चर्चा तेज हो गई है, जिसमें बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधियों को कैबिनेट स्तर की सुविधाएं दी गई थीं।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से क्यों किया इनकार?

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता हाईकोर्ट के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर कर सकता है। अदालत ने कहा, “हम इस याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्ता को हाईकोर्ट के समक्ष पुनरीक्षण याचिका दायर करने की स्वतंत्रता देते हैं.”

यह मामला कर्नाटक सरकार के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें विभिन्न बोर्ड और निगमों के अध्यक्ष पद पर नियुक्त 42 जनप्रतिनिधियों को कैबिनेट दर्जा दिया गया था। इनमें विधायक (MLA) और विधान परिषद सदस्य (MLC) भी शामिल हैं।

हाईकोर्ट के फैसले को दी गई थी चुनौती

सुप्रीम कोर्ट में यह अपील कर्नाटक राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड में कार्यरत सूरी पायला की ओर से दाखिल की गई थी। उन्होंने कर्नाटक हाईकोर्ट के 4 मार्च के आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी।

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने इस मामले को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लिया। वहीं हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि याचिका पूरी तरह जनहित में नहीं लगती और इसमें याचिकाकर्ता के निजी हित भी जुड़े हो सकते हैं।

हाईकोर्ट ने कहा था, “हमें इस तर्क में भी दम लगता है कि यह याचिका पूरी तरह से जनहित में नहीं है बल्कि याचिकाकर्ता की कुछ पदों के लिए आकांक्षाओं के कारण भी दायर की गई है.”

कैबिनेट दर्जा देने पर क्या है विवाद?

याचिका में आरोप लगाया गया कि इन जनप्रतिनिधियों को कैबिनेट दर्जा देकर अतिरिक्त सरकारी सुविधाएं और आर्थिक लाभ दिए जा रहे हैं। इनमें अधिक वेतन, सरकारी वाहन, चालक, ईंधन भत्ता, मकान किराया भत्ता और चिकित्सा प्रतिपूर्ति जैसी सुविधाएं शामिल हैं।

याचिकाकर्ता का दावा है कि यह ‘लाभ का पद’ (Office of Profit) की श्रेणी में आता है और इससे संविधान के अनुच्छेद 191 का उल्लंघन होता है। इस अनुच्छेद के तहत जनप्रतिनिधियों को लाभ के पद धारण करने पर अयोग्य ठहराया जा सकता है।

संविधान के कई अनुच्छेदों के उल्लंघन का आरोप

याचिका में यह भी कहा गया कि विधायकों और विधान परिषद सदस्यों को बोर्ड और निगमों का अध्यक्ष बनाना अपने आप में गलत नहीं है, लेकिन उन्हें कैबिनेट दर्जा देना संविधान के अनुच्छेद 164(1A) का उल्लंघन है। यह अनुच्छेद मंत्रिपरिषद के आकार को सीमित करता है ताकि सरकार का अनावश्यक विस्तार न हो।

याचिका के अनुसार, 26 जनवरी 2025 को कर्नाटक सरकार ने 34 जनप्रतिनिधियों को कैबिनेट दर्जा दिया था, जबकि आठ अन्य को पहले से यह सुविधा प्राप्त थी। एक ही सरकारी आदेश में इतनी बड़ी संख्या में नेताओं को कैबिनेट स्तर की सुविधाएं देने को लेकर सवाल उठाए गए हैं।

इसके अलावा याचिका में कहा गया कि ये नियुक्तियां संविधान के अनुच्छेद 102, 191 और 164 के साथ-साथ कर्नाटक विधानमंडल (अयोग्यता निवारण) अधिनियम 1956 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 10 का भी उल्लंघन करती हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *