सिर्फ ब्राह्मण-राजपूत ही नहीं, यादव भी करते हैं जुल्म, UGC बिल पर पप्पू यादव ने बोल दी कड़वी सच्चाई

पूर्णिया/पटना: यूजीसी के नए नियमों (UGC Rules 2026) पर देश भर में मचे घमासान के बीच बिहार के पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव ने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने सियासी गलियारों में हलचल तेज कर दी है. बुधवार (28 जनवरी) को मीडिया से बातचीत करते हुए पप्पू यादव ने यूजीसी बिल का खुला समर्थन किया और जातिगत प्रताड़ना को लेकर एक कड़वा सच सबके सामने रखा. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि अत्याचार सिर्फ सवर्ण (भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत) नहीं करते, बल्कि पिछड़ी जातियों के लोग भी इसमें पीछे नहीं हैं.

‘प्रताड़ना में यादवों की भूमिका ज्यादा होती है’

सांसद पप्पू यादव ने करणी सेना और सवर्ण संगठनों के विरोध प्रदर्शनों पर टिप्पणी करते हुए मीडिया और समाज को आईना दिखाया. उन्होंने जातिगत समीकरणों पर बेबाक राय रखते हुए कहा, “मैं तो कहता हूं कि राजपूत समाज के लोग प्रताड़ित हो रहे हैं तो आगे आएं… लेकिन जिस तरह से मीडिया में आ रहा है कि भूमिहार, कायस्थ, ब्राह्मण, राजपूत… क्या यही लोग सिर्फ प्रताड़ित करते हैं और लोग प्रताड़ित नहीं करते हैं? प्रताड़ना में यादव की भूमिका ज्यादा होती है. कुर्मी समाज, कुशवाहा समाज की भी भूमिका होती है. दलित में भी कुछ मजबूत समाज है, वह भी प्रताड़ित करते हैं, लेकिन वह दबंगई नहीं करते हैं.”

‘विवाद न फैलाएं, यह कमजोरों की रक्षा का कानून है’

पप्पू यादव ने इस बिल को छात्रों के हित में बताते हुए इसका समर्थन किया है. उन्होंने कहा, “एक ऐसा लॉ बनाया गया है जिसमें किसी भी तरह के कमजोर तबके के बच्चों को शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से प्रताड़ित न होना पड़े. उनके अधिकार को संरक्षित किया गया है. आप लोग अपनी बात को एक जगह रखिए. उसको कोर्ट देखेगा. मैं आग्रह करूंगा कि इस पर विवाद नहीं फैलाएं.” उनका मानना है कि यह कानून किसी जाति के खिलाफ नहीं, बल्कि शोषण के खिलाफ है.

‘जिनकी दुकान बंद है, वो समाज तोड़ रहे हैं’

विरोध करने वाले नेताओं पर तंज कसते हुए पप्पू यादव ने कहा कि हमारे बच्चे समाज को नहीं तोड़ रहे हैं, बल्कि जिनकी राजनीति की दुकान नहीं चल रही है, वे ऐसी बातें कर समाज को बांटने में लगे हैं. उन्होंने स्पष्ट किया कि जिसे ‘जनरल’ या शोषक वर्ग कहा जाता है, उसमें जमीनी हकीकत में सिर्फ सवर्ण ही नहीं, बल्कि यादव, कोइरी और कुर्मी भी शामिल हैं. उन्होंने स्वीकार किया कि जहां भी सामाजिक शोषण होता है, वहां ओबीसी जातियां भी बराबर की जिम्मेदार होती हैं.

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