क्या कानून से ऊपर हैं चुनाव आयुक्त? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और आयोग से मांगा जवाब, ‘आजीवन सुरक्षा’ पर उठे सवाल

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को अदालती कार्रवाई से बचाने वाले ‘सुरक्षा कवच’ को अब सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। सोमवार को शीर्ष अदालत ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और भारतीय चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। दरअसल, कोर्ट में उस कानूनी प्रावधान पर सवाल उठाए गए हैं जो चुनाव आयुक्तों को उनके पद पर रहते हुए लिए गए फैसलों के लिए रिटायरमेंट के बाद भी आजीवन कानूनी कार्यवाही से सुरक्षा (Immunity) प्रदान करता है।

राष्ट्रपति और राज्यपाल को भी नहीं मिलती ऐसी छूट

इस याचिका को एनजीओ ‘लोक प्रहरी’ की तरफ से दायर किया गया है। सोमवार को सुनवाई के दौरान एनजीओ के सचिव और पूर्व आईएएस अधिकारी एस.एन. शुक्ला ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 की वैधानिकता पर सवाल खड़े किए। उन्होंने दलील दी कि यह धारा संविधान के अनुच्छेद 14, यानी समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। शुक्ला ने तर्क दिया कि देश में राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पदों को भी सेवाकाल समाप्त होने के बाद ऐसी सुरक्षा नहीं मिलती, जो अब चुनाव आयुक्तों को दी जा रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस धारा को संसद में बिना किसी ठोस चर्चा के अंतिम समय में जोड़ा गया था।

कोर्ट परखेगा कानूनी वैधता

चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच ने मामले की गंभीरता को समझते हुए याचिका को स्वीकार कर लिया। हालांकि, कोर्ट ने धारा 16 पर तत्काल रोक लगाने की याचिकाकर्ता की मांग को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि दूसरे पक्ष को सुने बिना ऐसा आदेश नहीं दिया जा सकता। सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि, “इस बात को देखा जाएगा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों को दिया गया संरक्षण कानूनी दृष्टि से सही है या नहीं.” अब इस मामले में केंद्र और चुनाव आयोग के जवाब का इंतजार है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *