
नई संसद की शुरुआत के मौके पर बुलाए गए विशेष सत्र में बहुत कुछ ऐतिहासिक हुआ, लेकिन एक सांसद का लोकसभा में दिया गया आपत्तिजनक बयान विवादों में आ गया।संसद की नई इमारत के साथ नई शुरुआत हुई। एक ऐतिहासिक विधेयक से नारी शक्ति के वंदन की बात हुई। इन सभी उपलब्धियों की चर्चा खत्म भी नहीं हुई थी कि भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी के एक बयान ने देश में राजनीतिक तूफान ला दिया। उनके बयान पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह खेद जता चुके हैं। वहीं, विपक्ष लगातार इस पर हमलावर है। बसपा सांसद दानिश अली इसे लेकर लोकसभा अध्यक्ष को शिकायती पत्र लिख चुके हैं। इसमें वो सांसदी छोड़ने तक की बात कह रहे हैं। निश्चित रूप से यह देखना होगा कि हम इसे किस रूप में देखते हैं। जो सड़कछाप भाषा होती है, वह भी व्यक्तिगत होती है, लेकिन संसद में जो बात बोली गई है, वो पूरे समुदाय के लिए बोली गई है। रमेश बिधूड़ी ने जो बोला है, वो पूरे समुदाय के खिलाफ बोला है। कहा जा रहा है कि भाजपा ने नोटिस दे दिया है। लोकसभा के विशेष सत्र में भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी के अमर्यादित बयान पर विपक्ष ने तीखी निंदा की है. उन्होंने बसपा सांसद पर अपशब्दों की बौछार कर दी. लोकसभा अध्यक्ष ने उनके इस अमर्यादित बयान को सदन कि कार्यवाही से हटाने का निर्देश दिया है। बावजूद इसके यह सवाल अब आम है कि कानूनी संरक्षण की आड़ में आखिर कब तक सांसद, विधायक अपशब्दों की बौछार करते रहेंगे और क्यों? ऐसा करने वाले बिधूड़ी पहले संसद सदस्य नहीं हैं। कई बार विपक्ष और सत्ता पक्ष के नेता एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने को अमर्यादित, असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करते देखे जा रहे हैं. हाल के वर्षों में यह सिलसिला काफी तेज हुआ है.अब तो पब्लिक सवाल पूछने लगी है कि आखिर इन पर कार्रवाई क्यों नहीं की जाती? क्या ये माननीय नियम-कानून से ऊपर हैं? सच यही है कि इस मामले में देश के सभी सांसद-विधायक को कानूनी संरक्षण प्राप्त हैं। संसद या विधान सभा में उनके किसी भी कृत्य पर सजा देने का काम केवल पीठासीन अधिकारी ही कर सकते हैं क्योंकि सामान्य भारतीय कानून सदन के अंदर लागू नहीं होता है. शायद यही कारण है कि सदन में आते ही माननीय कुछ भी बोल जाते हैं. जैसे-जैसे भारत में लोकतंत्र की उम्र बढ़ रही है, वैसे-वैसे माननीय कुछ ज्यादा ही अमर्यादित होते जा रहे हैं.पहले जब कोई बड़ा नेता बोलता था तो क्या सत्ता पक्ष, क्या प्रतिपक्ष, दोनों ध्यान से सुनते थे. फिर अपनी बारी आने पर बोलते थे। अनेक असहमतियों के बावजूद अटल बिहारी वाजपेई, चंद्रशेखर, इंदिरागांधी जैसे नेता सुने जाते थे। नेहरू ने वैचारिक असहमति के बावजूद अपनी पहली कैबिनेट में कई लोगों को मंत्री बनाया था। पीएम नरसिंह राव ने अटल जी को देश का प्रतिनिधि बनाकर संयुक्त राष्ट्र भेजा था. पर, आज इन्हें इस बात का ध्यान भी नहीं रहा कि इनके अमर्यादित व्यवहार को पूरी दुनिया देख रही है.सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता विनीत जिंदल कहते हैं कि पीठासीन अधिकारी अगर अपने अधिकारों का असल में उपयोग करें तो यह हरकतें रुक सकती हैं. सदन के अंदर उनके पास बहुत अधिकार हैं। मुश्किल यह है कि कागज में न्यूट्रल और असल में पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा उन्हें ऐसा करने से रोकती है। नतीजा, हमारे-आपके सामने है. वे चाहें तो अमर्यादित व्यवहार पर, वक्तव्य पर, विशेषाधिकार हनन की कार्यवाही शुरू कर सकते हैं. ऐसा होते हुए देखा भी जाता है लेकिन यह सुनवाई वर्षों तक चलती है तब तक आरोपी का कार्यकाल कई बार खत्म हो चुका होता है. समय आ गया है कि सदन की गरिमा बनाए रखने को पीठासीन अधिकारी सामने आकर अपनी भूमिका अदा करें।