समय पर न्याय वक़्त की मांग

आंकड़ों पर नजर डालें तो लंबित मुकदमों के आंकडे चौंकाने वाले हैं। देश की सबसे बडी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में लगभग 70 हजार से ज्यादा मामले पेंडिंग हैं। हालांकि, मुकदमों की पेंडेंसी कम करने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। कानून मंत्रालय ने लोकसभा में बताया कि सुप्रीम कोर्ट में 1 जुलाई 2023 तक कुल 69,766 मुकदमें लंबित हैं। कानून मंत्रालय के मुताबिक, देशभर की निचली अदालतों में 4 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं। संसद मे दिए आंकड़ों की माने तो देश भर की निचली अदालतों में 4,41,97,115 मामले लंबित हैं। देशभर की निचली अदालतों में 10 साल पुराने लंबित केसों की संख्या 8,73,587 और 15 साल से लंबित केसों की संख्या 3,09,792 हैं। देशभर की निचली अदालतों में 30 साल से भी ज्यादा पुराने लंबित केसों की संख्या 1,01,837 है। वहीं, देश भर की निचली अदालतों में 15 जुलाई 2023 तक लंबित सिविल मामलों की संख्या 1,10,40,184 है। देश भर की निचली अदालतों में 15 जुलाई 2023 तक लंबित क्रिमनल मामलों की संख्या 3,31,56,931 हैं। आंकडो के मुताबिक, उत्तर प्रदेश की निचली अदालतों में सबसे ज्यादा एक करोड़ मामले लंबित हैं। उत्तर प्रदेश की निचली अदालतों में सबसे ज्यादा 1,16,09,332 केस हैं।दिल्ली की निचली अदालतों में 12 लाख मामले हैं। दिल्ली की निचली अदालतों में 12,27,491 मामले , पंजाब में 91,65,17 मामले, हरियाणा 15, 32,073 मामले लंबित हैं। महाराष्ट्र की निचली अदालतों में 51,07,191 मामले, बिहार में 35,00,929 ,पश्चिम बंगाल में 29,03,515 मामले और राजस्थान 22,71,582 मामले लंबित हैं। सिर्फ लद्दाख की निचली अदालतों में सबसे कम 1206 केस लंबित हैं।दिल्ली हाईकोर्ट में 1,10,951, बॉम्बे हाई कोर्ट में 7,00,214 , राजस्थान हाईकोर्ट में 6,52,093, मद्रास हाई कोर्ट में 5,51,953 मध्य प्रदेश में 4,45,498, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में 4,42,805 मुकदमे लंबित हैं। देशभर के हाईकोर्ट में 10 साल से लंबित केसों की संख्या 1,83,146 और 15 साल से लंबित केसों की संख्या 1,11,847 है। जबकि, 30 साल से भी ज्यादा पुराने लंबित केसों की संख्या 71,204 है। इस तरह मे यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने उच्च न्यायालयों और न्यायाधिकरणों में वर्चुअल यानी आभासी सुनवाई बंद होने का संज्ञान लिया। उसने सभी उच्च न्यायालयों के साथ राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण, राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण को भी नोटिस जारी कर उनके रजिस्ट्रारों से पूछा है कि क्या वर्चुअल सुनवाई समाप्त कर दी गई है? इन सभी से यह बताने को भी कहा गया है कि यदि वर्चुअल सुनवाई बंद हो गई है तो उसके कारण क्या हैं? आखिर जब कोविड काल में वर्चुअल सुनवाई की उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है, तब फिर इस सिलसिले को समाप्त करने का कोई औचित्य नहीं।न्यायालयों में तकनीक का प्रयोग वादी-प्रतिवादी के साथ वकीलों के लिए भी सुगम था। वे कहीं पर भी रहते हुए न्यायालयों में आभासी रूप से उपस्थित हो सकते थे। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट ने न्यायालयों में हाइब्रिड तरीके से सुनवाई की आवश्यकता जताई थी। यह तरीका न केवल जारी रहना चाहिए, बल्कि उसे बढ़ावा भी दिया जाना चाहिए, ताकि निचली अदालतों में मुकदमे लड़ने वालों को भी उसका लाभ मिले। आवश्यक केवल यह नहीं है कि न्यायालय तकनीक का अधिकाधिक उपयोग करें, बल्कि यह भी है कि वे उन आवश्यक संसाधनों से लैस हों, जिनसे मामलों का निस्तारण यथाशीघ्र हो सके।गत दिवस ही सुप्रीम कोर्ट की ओर से यह जानकारी दी गई कि उसकी वेबसाइट से मुकदमों की आनलाइन जानकारी प्राप्त की जा सकती है। इस वेबसाइट में इसका भी विवरण उपलब्ध होगा कि सुप्रीम कोर्ट में कितने मामले लंबित हैं और कितनों का निस्तारण हो चुका है? निःसंदेह इस व्यवस्था से पारदर्शिता की ओर एक कदम आगे बढ़ाया गया है, लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं। बात तब बनेगी, जब तारीख पर तारीख का सिलसिला बंद होगा और लोगों को समय पर न्याय मिलेगा।इसके लिए निचली अदालतों से लेकर उच्चतर अदालतों में न्यायाधीशों की संख्या तो बढ़ानी ही होगी, उन कारणों का निवारण भी करना होगा, जिनके चलते मामले लंबे खिंचते रहते हैं। इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों की संख्या चार करोड़ के आंकड़े को पार कर गई है। यह निराशाजनक स्थिति है। इससे देश को उबारना ही होगा। इसके लिए न्यायिक तंत्र में तकनीक का उपयोग करने के साथ अदालतों के काम करने के ढर्रे को भी बदलना होगा।

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